नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोना न खरीदने, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसी आधुनिक कार्यसंस्कृति अपनाने के आह्वान ने देश में एक नया राजनीतिक और सामाजिक विमर्श छेड़ दिया है। प्रधानमंत्री का तर्क है कि डिजिटल गोल्ड की ओर बढ़ना, ऊर्जा संरक्षण और लचीली कार्यशैली भारत को आत्मनिर्भर बनाने और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता से सुरक्षित रखने के लिए अनिवार्य हैं। सरकार के अनुसार, फिजिकल सोने के बजाय सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में निवेश करने से देश का कीमती विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा और पेट्रोल-डीजल की बचत से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी। साथ ही, वर्क फ्रॉम होम से शहरों में ट्रैफिक का दबाव कम होगा और महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ेगी।
हालांकि, इन अपीलों ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा हथियार थमा दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे सरकार की आर्थिक विफलताओं का स्वीकारोक्ति करार देते हुए कहा है कि 12 साल के शासन के बाद जनता से ‘त्याग’ की मांग करना प्रधानमंत्री की अपनी नीतियों की हार है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपनी जवाबदेही जनता पर मढ़ रही है। राहुल गांधी ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह जनता को दिया गया उपदेश नहीं बल्कि नाकामी का सबूत है, जहाँ लोगों को अब यह बताया जा रहा है कि वे क्या खरीदें और कहाँ जाएँ। अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं ने भी इसे ‘आर्थिक आपातकाल’ जैसी स्थिति बताते हुए सवाल उठाया कि यदि मध्यम वर्ग खरीदारी और यात्रा बंद कर देगा, तो देश की अर्थव्यवस्था और 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य कैसे हासिल होगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच समाज के विभिन्न वर्गों में भी मिश्रित प्रतिक्रिया है। जहाँ एक ओर पर्यावरण प्रेमी और आर्थिक विशेषज्ञ इन अपीलों को दूरगामी सुधार के रूप में देख रहे हैं, वहीं पारंपरिक उद्योग और छोटे व्यापारी डरे हुए हैं। ज्वैलरी उद्योग, ऑटोमोबाइल सेक्टर और ऑफिसों के इर्द-गिर्द पनपने वाली सूक्ष्म अर्थव्यवस्था (जैसे टैक्सी चालक और टिफिन सर्विस) को अंदेशा है कि इन बदलावों से उनकी रोजी-रोटी पर संकट आ सकता है। अंततः, यह मुद्दा अब केवल एक आर्थिक अपील न रहकर राजनीतिक रणक्षेत्र बन गया है, जहाँ सरकार इसे ‘राष्ट्रहित’ बता रही है और विपक्ष इसे ‘बढ़ती महंगाई और नीतिगत विफलता’ को छिपाने का एक इवेंट मैनेजमेंट करार दे रहा है। आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता प्रधानमंत्री की इस ‘आर्थिक देशभक्ति’ वाली अपील को कितनी गंभीरता से लेती है।