
संतकबीरनगर की राजनीति में कुछ नाम केवल इतिहास नहीं होते, वे राजनीतिक संदर्भ बन जाते हैं। पूर्व सांसद स्व0 भालचंद यादव भी ऐसा ही एक नाम हैं। आज वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अमरडोभा की घटना के बाद सपा के भीतर और समर्थकों के बीच उनके नाम की चर्चा फिर तेज होना बताता है कि नेतृत्व की तुलना केवल वर्तमान से नहीं, अतीत से भी होती है।
18 सितंबर को बखिरा क्षेत्र के अमरडोभा में गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान विवाद हुआ। सपा सांसद लक्ष्मीकांत उर्फ पप्पू निषाद की शिकायत पर अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ तो दूसरे पक्ष की शिकायत पर सांसद समेत कई लोगों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जुटाकर जांच आगे बढ़ाने की बात कही है।
इसके बाद मामला और पेचीदा हुआ। सांसद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने वाले विशाल कुमार के लापता होने पर उनके भाई की तहरीर पर जिला पंचायत सदस्य विश्वकेतु यादव, सांसद के पीए समेत चार लोगों के खिलाफ अपहरण और एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ। बाद में पुलिस ने युवक को बरामद कर चार गिरफ्तारियां किए जाने की जानकारी दी। यही वह मोड़ है, जहां संतकबीरनगर की राजनीतिक स्मृति में भालचंद यादव फिर दिखाई देने लगते हैं। स्व0 भालचंद यादव की राजनीति को याद करने वाले लोग उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनके मुखर और संघर्षशील तेवरों को बताते हैं। उनके राजनीतिक सफर पर प्रकाशित पुराने विवरणों में भी आंदोलनकारी राजनीति और जिले के मुद्दों पर सीधे संघर्ष का उल्लेख मिलता है। यहां तक कि संतकबीरनगर का जिला दर्जा समाप्त किए जाने के विरोध में उन्होंने तत्कालीन सपा से दूरी बनाकर अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया था। यानी भालचंद की राजनीति का एक संदेश साफ था कि मुद्दा यदि जिले का है तो राजनीतिक सुविधा बाद में, संघर्ष पहले। यही वजह है कि आज अमरडोभा प्रकरण के बीच उनके पुराने वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं। समर्थक उन बयानों को वर्तमान घटनाक्रम से जोड़ रहे हैं और सवाल कर रहे हैं कि जिस समय मुकदमों, गिरफ्तारी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, उस समय वैसी मुखर राजनीतिक आवाज कहां है?यह सवाल सिर्फ भालचंद की याद नहीं है। यह मौजूदा नेतृत्व की शैली पर उठता हुआ सवाल भी है। भालचंद यादव की राजनीति में सड़क, थाना, तहसील और प्रशासनिक कार्यालय राजनीतिक संघर्ष के स्वाभाविक मंच थे। आज की राजनीति में सोशल मीडिया, प्रेस बयान और कानूनी प्रक्रिया ने काफी जगह ले ली है। फर्क यहीं दिखाई देता है।भालचंद समर्थकों की नजर में नेता का मतलब था—कार्यकर्ता के साथ खड़ा होना, प्रशासन से सीधे सवाल करना और राजनीतिक संकट को सार्वजनिक मुद्दा बनाना।मौजूदा सपा नेतृत्व के सामने चुनौती अलग है। सांसद खुद एक विवाद में कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। उनके पक्ष में पथराव और वाहन क्षतिग्रस्त होने का आरोप है, जबकि दूसरे पक्ष ने उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। दोनों पक्षों की शिकायतों पर मुकदमे दर्ज होना बताता है कि मामला एकतरफा पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है। ऐसे माहौल में नेतृत्व की परीक्षा बयान देने से ज्यादा संकट को राजनीतिक और कानूनी स्तर पर व्यवस्थित ढंग से संभालने की क्षमता से होती है।यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रहा है। लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है। स्व सांसद भालचंद यादव के दौर की राजनीति को हूबहू आज पर लागू नहीं किया जा सकता। राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। सोशल मीडिया की भूमिका बढ़ी है, कानूनी प्रक्रिया अधिक दस्तावेजी और निगरानी-आधारित हुई है तथा किसी भी विवाद में वीडियो, सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण हो चुके हैं।इसलिए आज नेतृत्व के सामने चुनौती केवल आक्रामक होने की नहीं, बल्कि आक्रामकता और राजनीतिक रणनीति के बीच संतुलन बनाने की भी है.अमरडोभा मामले में पुलिस द्वारा सीसीटीवी और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जुटाए जाने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे में राजनीतिक दावों से अधिक महत्व जांच से निकलने वाले तथ्यों का होगा।यही वह जगह है जहां भालचंद की पुरानी शैली और आज की राजनीति का अंतर दिखाई देता है।भालचंद यादव को याद करने वालों की संख्या इसलिए नहीं बढ़ी कि अतीत वापस आ गया है। बल्कि इसलिए कि वर्तमान ने अतीत की एक राजनीतिक छवि को फिर सामने ला दिया है।आज सपा के सामने सवाल है कि कार्यकर्ताओं में भरोसा कैसे कायम रखा जाए? मुकदमों का राजनीतिक जवाब किस स्तर पर दिया जाए? प्रशासन के सामने पार्टी का पक्ष कौन मजबूती से रखे? और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि संकट के समय संगठन की सामूहिक आवाज कहां सुनाई दे?इन सवालों का जवाब किसी एक व्यक्ति के नाम में नहीं छिपा है। लेकिन भालचंद यादव का राजनीतिक अध्याय यह जरूर याद दिलाता है कि संगठन का नेतृत्व केवल पद से नहीं, संकट के समय दिखाई देने वाली राजनीतिक सक्रियता से भी पहचाना जाता है।अमरडोभा प्रकरण की जांच अभी जारी है। आरोपों की सच्चाई जांच और न्यायिक प्रक्रिया से तय होगी। लेकिन इस घटनाक्रम ने सपा के भीतर एक पुरानी बहस जरूर जगा दी है कि क्या पार्टी के पास आज ऐसी राजनीतिक आवाज है, जो मुश्किल वक्त में कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिला सके कि नेतृत्व उनके साथ खड़ा है? यही वह सवाल है, जिसने संतकबीरनगर में स्व भालचंद यादव को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।स्व0 भालचंद अब दुनियां में नहीं हैं, लेकिन उनका राजनीतिक तेवर आज भी एक पैमाना बनकर सामने आ रहा है। अमरडोभा ने घटना से ज्यादा एक नेतृत्व-सवाल पैदा किया है—सपा का अगला संघर्षशील चेहरा कौन है?