संपादकीय | विशेष टिप्पणी| मन की बात…..
कभी पुलिस की वर्दी का नाम सुनते ही अपराधियों के चेहरे पर खौफ दिखाई देता था। थाने की चौखट तक पहुंचने से पहले ही अपराध करने वाला कई बार अपने कदम पीछे खींच लेता था। पुलिस की सख्ती की चर्चा गांव की चौपाल से लेकर बाजार तक होती थी और अपराधी यह सोचने पर मजबूर रहता था कि अगर वह कानून तोड़ेगा तो पुलिस उसके दरवाजे तक पहुंच जाएगी। वक्त बदला, पुलिसिंग की तस्वीर बदली और लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को ‘मित्र पुलिस’ बनाने की अवधारणा सामने आई। इसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था कि पुलिस जनता की रक्षक बने, नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करे और कानून लागू करते समय मानवाधिकारों का सम्मान करे। लेकिन आज एक सवाल समाज के बीच लगातार खड़ा हो रहा है? क्या मित्र पुलिस की अवधारणा कहीं पुलिस के इकबाल को कमजोर तो नहीं कर रही? यह सवाल किसी एक पुलिसकर्मी, एक थाने या किसी एक जिले पर टिप्पणी नहीं है। यह बदलते सामाजिक परिवेश और अपराध के बदलते तौर-तरीकों पर एक व्यापक चिंता है। आज अपराध की दुनिया में ऐसे चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं, जो उम्र में बहुत छोटे हैं। कुछ युवक मामूली विवाद से शुरू होकर मारपीट, धमकी, असलहा प्रदर्शन, फायरिंग और दूसरे गंभीर अपराधों तक पहुंच जाते हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को एक नया मंच भी दे दिया है। हथियारों के साथ तस्वीरें, बाइक पर स्टंट, दबंगई के वीडियो और कानून को चुनौती देती भाषा कई बार युवाओं के बीच प्रभाव पैदा करती दिखाई देती है! सबसे चिंताजनक बात यह है कि जरायम की दुनिया में पहला कदम रखने वाले कुछ युवाओं के मन में भी पुलिस का वह पारंपरिक भय दिखाई नहीं देता, जो कभी अपराध रोकने की एक बड़ी वजह माना जाता था।
एक समय था जब पुलिस की कठोर छवि अपराधियों के मनोविज्ञान पर असर डालती थी। थानों में सख्ती, तत्काल कार्रवाई और पुलिस की तेज प्रतिक्रिया से अपराधियों को यह संदेश मिलता था कि कानून से बचना आसान नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि पुराने दौर की पुलिसिंग में ऐसी कई कार्यप्रणालियां थीं, जिन्हें आज लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जा सकता। हिरासत में मारपीट, थर्ड डिग्री या किसी व्यक्ति को कानून से बाहर जाकर दंड देना न्याय का विकल्प नहीं हो सकता!मानवाधिकारों की रक्षा इसलिए जरूरी है क्योंकि पुलिस भी कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन मानवाधिकारों की रक्षा और पुलिस की निष्क्रियता दो अलग-अलग बातें हैं। अब यहीं से असली बहस शुरू होती है। मौजूदा समय मे मीडिया की सक्रियता बढ़ी है। सोशल मीडिया हर घटना को तुरंत सार्वजनिक कर देता है। मानवाधिकार संस्थाएं पुलिस की कार्यप्रणाली पर नजर रखती हैं। न्यायालयों ने भी पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए समय-समय पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। यह सब लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। पुलिस को भी जवाबदेह और संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन क्या इन सबके बीच पुलिसकर्मी के भीतर कार्रवाई को लेकर अनावश्यक भय पैदा हो जाए, तो उसका असर कानून-व्यवस्था पर नहीं पड़ेगा? पुलिसकर्मी के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ उसे अपराध रोकना है, दूसरी तरफ कार्रवाई के हर कदम का जवाब भी देना है। ऐसे माहौल में यदि पुलिसकर्मी कार्रवाई करने से पहले कई स्तरों पर आशंकित रहने लगे तो इसका सीधा असर पुलिसिंग की गति पर पड़ सकता है। इसलिए जरूरत सख्ती बनाम मानवाधिकार की लड़ाई खड़ी करने की नहीं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाने की है। पुलिस का मित्रवत चेहरा आम नागरिक के लिए भरोसे का प्रतीक होना चाहिए। पीड़ित व्यक्ति थाने पहुंचे तो उसे यह महसूस होना चाहिए कि पुलिस उसकी बात सुनेगी। महिला, बुजुर्ग, गरीब, मजदूर या किसी भी सामान्य नागरिक को थाने जाने में डर नहीं लगना चाहिए। पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह जनता की शिकायत सुने, पीड़ित को सुरक्षा दे और निष्पक्ष जांच करे।लेकिन दूसरी तरफ अपराधी के मन में यह स्पष्ट संदेश भी होना चाहिए कि कानून तोड़ने पर कार्रवाई निश्चित है। मित्र पुलिस का मतलब कमजोर पुलिस नहीं है। मित्र पुलिस का मतलब यह भी नहीं है कि अपराधी के साथ नरमी बरती जाए। मित्र पुलिस का वास्तविक अर्थ है—जनता के साथ संवेदनशीलता और अपराध के खिलाफ कानून सम्मत दृढ़ता!आज पुलिस के सामने सबसे बड़ी जरूरत इसी संतुलन की है। अपराध नियंत्रण केवल थाने में आरोपी की पिटाई से नहीं होता। बल्कि मजबूत पुलिसिंग वह है, जिसमें पुलिस के पास अपराध की सूचना समय से पहुंचे, बीट व्यवस्था सक्रिय हो, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जाए, सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्यों का इस्तेमाल हो, सर्विलांस और तकनीकी जांच प्रभावी हो और अपराधी के खिलाफ मुकदमा मजबूत साक्ष्यों के साथ न्यायालय तक पहुंचे।अगर किसी अपराधी को यह भरोसा हो जाए कि वह अपराध करने के बाद राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या किसी अन्य प्रभाव के जरिए बच सकता है, तो कानून का भय समाप्त होने लगता है। इसके विपरीत यदि उसे पता हो कि अपराध छोटा हो या बड़ा, पुलिस निष्पक्षता से जांच करेगी और कानून की प्रक्रिया अंत तक जाएगी, तो यही व्यवस्था अपराध नियंत्रण का मजबूत आधार बनती है। यही कारण है कि पुलिस की कार्यक्षमता का आकलन केवल गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं, बल्कि अपराध की रोकथाम, जांच की गुणवत्ता, अभियोजन की मजबूती और पीड़ित को न्याय मिलने की गति से किया जाना चाहिए। आज जरूरत यह भी है कि पुलिसकर्मियों को कानून सम्मत कार्रवाई के लिए संस्थागत संरक्षण और प्रशिक्षण मिले। यदि कोई पुलिसकर्मी ईमानदारी से, निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करता है, तो उसे यह विश्वास होना चाहिए कि पूरी व्यवस्था उसके साथ खड़ी होगी। वहीं यदि कोई पुलिसकर्मी अधिकारों का दुरुपयोग करता है, तो उसके खिलाफ भी निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। यही संतुलन पुलिस को मजबूत बनाएगा।समाज में पुलिस का भय पूरी तरह खत्म हो जाना भी ठीक नहीं और पुलिस के नाम पर आम नागरिक भयभीत रहे, यह भी लोकतंत्र की तस्वीर नहीं हो सकती।
आज खाकी के सामने चुनौती सिर्फ अपराधियों की नहीं है। चुनौती बदलते समाज, बदलती तकनीक, सोशल मीडिया, युवाओं में बढ़ती आक्रामकता और तेजी से बदलते अपराध के तरीकों की भी है। इसलिए पुलिसिंग का तरीका भी आधुनिक होना जरूरी है।
अब वह दौर नहीं है जब केवल डंडे के बल पर कानून-व्यवस्था कायम रखने की कल्पना की जाए। आज पुलिस को तकनीक, खुफिया तंत्र, वैज्ञानिक जांच, बेहतर संवाद और मजबूत अभियोजन के साथ आगे बढ़ना होगा।लेकिन आधुनिक पुलिसिंग का अर्थ यह भी नहीं कि अपराधी के सामने पुलिस की दृढ़ता दिखाई ही न दे।
पुलिस यदि जनता की मित्र है तो यह लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन वही पुलिस अपराधी के सामने कानून की मजबूत दीवार भी होनी चाहिए। पीड़ित को भरोसा और अपराधी को कानून का भय-इन दोनों के बीच ही पुलिस की वास्तविक भूमिका तय होती है।
इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि पुलिस पुरानी सख्ती की ओर लौटे या पूरी तरह नरम हो जाए। बहस यह होनी चाहिए कि कानून के दायरे में रहते हुए पुलिस को इतना प्रभावी कैसे बनाया जाए कि अपराध करने से पहले ही अपराधी सौ बार सोचने को मजबूर हो।क्योंकि लोकतंत्र में पुलिस का डर लक्ष्य नहीं है।लक्ष्य है ऐसा हो कि कानून का ऐसा इकबाल नजर आये जिसके सामने अपराधी की हिम्मत और पीड़ित का डर दोनों समाप्त हो जाएं।