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संतकबीरनगर। फाग की परंपरा को अपनी रचनाओं में संजोने वाले आदित्य प्रसाद पांडेय उर्फ ‘रसीले बाबा’ का 98 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन से हरिहरपुर में शोक की लहर है। फाग कविता और साहित्य के क्षेत्र में पहचान बनाने वाले रसीले बाबा ने इस लोक विधा पर आधारित कई पुस्तकों की रचना की थी। मूल रूप से हरिहरपुर के निवासी रसीले बाबा का जुड़ाव उस सांस्कृतिक विरासत से था, जिसके लिए यह कस्बा प्रसिद्ध फाग कवि रंगपाल की धरती के रूप में जाना जाता है। उनके निधन से क्षेत्र ने लोक साहित्य के एक समर्पित रचनाकार को खो दिया। रसीले बाबा सूर्या इंटरनेशनल एकेडमी के निष्ठावान कर्मी आशुतोष पांडेय के बाबा थे। निधन की सूचना पर सूर्या ग्रुप ऑफ कॉलेज के चेयरमैन डॉ. उदय प्रताप चतुर्वेदी आशुतोष के आवास पहुंचे। उन्होंने शोकाकुल परिवार से मिलकर संवेदना जताई और हर सुख-दुःख में साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया। इस दौरान जिला पंचायत प्रशासक बलराम यादव भी मौजूद रहे। उन्होंने भी रसीले बाबा के निधन पर दुःख व्यक्त किया और परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की। रसीले बाबा भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन फाग साहित्य के प्रति उनका समर्पण और उनकी रचनाएं लोक संस्कृति की स्मृतियों में उन्हें जीवित रखेंगी।

फाग साहित्य के साधक ‘रसीले बाबा’ नहीं रहे, 98 वर्ष की उम्र में निधन से हरिहरपुर में शोक

संतकबीरनगर। फाग की परंपरा को अपनी रचनाओं में संजोने वाले आदित्य प्रसाद पांडेय उर्फ ‘रसीले बाबा’ का 98 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन से हरिहरपुर में शोक की लहर है। फाग कविता और साहित्य के क्षेत्र में पहचान बनाने वाले रसीले बाबा ने इस लोक विधा पर आधारित कई पुस्तकों की रचना की थी।

मूल रूप से हरिहरपुर के निवासी रसीले बाबा का जुड़ाव उस सांस्कृतिक विरासत से था, जिसके लिए यह कस्बा प्रसिद्ध फाग कवि रंगपाल की धरती के रूप में जाना जाता है। उनके निधन से क्षेत्र ने लोक साहित्य के एक समर्पित रचनाकार को खो दिया।

रसीले बाबा सूर्या इंटरनेशनल एकेडमी के निष्ठावान कर्मी आशुतोष पांडेय के बाबा थे। निधन की सूचना पर सूर्या ग्रुप ऑफ कॉलेज के चेयरमैन डॉ. उदय प्रताप चतुर्वेदी आशुतोष के आवास पहुंचे। उन्होंने शोकाकुल परिवार से मिलकर संवेदना जताई और हर सुख-दुःख में साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया।

इस दौरान जिला पंचायत प्रशासक बलराम यादव भी मौजूद रहे। उन्होंने भी रसीले बाबा के निधन पर दुःख व्यक्त किया और परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की।

रसीले बाबा भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन फाग साहित्य के प्रति उनका समर्पण और उनकी रचनाएं लोक संस्कृति की स्मृतियों में उन्हें जीवित रखेंगी।

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