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संतकबीरनगर जिले में संपन्न हुए नगर निकाय चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए कुछ खास नही रहे। ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने का दावा करने वाले बीजेपी के आकाओं और सहयोगी दल निषाद पार्टी को जनता ने इस चुनाव में तगड़ा झटका दिया है। बीजेपी को जिले में सिर्फ 02 ही सीटों पर जीत मिली है। जिसमे एक पर जीत तो पहले ही तय मानी जा रही थी और दूसरे पर संवेदना के रथ पर सवार उम्मीदवार को जनता ने जीत दिला दी। दक्षिणांचल की दो सीटें जहां बीजेपी के खेमे में गई वहीं उत्तरांचल यानी मेंहदावल की चार सीटों बखिरा, मेंहदावल, बेलहर, धर्मसिंहवा से बीजेपी को बड़ी हार मिली। इन चारो सीटों पर निषाद विरादरी के वोटर्स जीत हार के लिए बहुत मायने रखते थे जिन्हें साधने की जिम्मेदारी बीजेपी ने निषाद पार्टी को सौप रखी थी जिसपर निषाद पार्टी के अध्यक्ष, सरकार में मंत्री डॉक्टर संजय निषाद, उनके पुत्र स्थानीय सांसद प्रवीण निषाद, पार्टी के विधायक अनिल त्रिपाठी खरे नहीं उतरे।  निषाद पार्टी के कोर वोटर्स सपा अथवा बसपा या अन्य दलों के साथ हो चले। खुद को निषाद समुदाय का रहनुमा बताने वाले डॉक्टर संजय निषाद बीजेपी के लिए कुछ नहीं कर सके। सांसद पुत्र और पार्टी विधायक के साथ निषाद बाहुल्य बस्तियों में जाकर उनसे बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने की उनकी अपील काम नही आई जिसके चलते बीजेपी मेंहदावल विधान सभा क्षेत्र की सभी सीटों पर बुरी तरह हारी। निषाद पार्टी के अगुआ की इस विफलता पर बीजेपी को मंथन करना पड़ेगा, क्योंकि नतीजे ये बताने के लिए काफी हैं कि निषाद समुदाय अब डॉक्टर संजय निषाद को घास नहीं डाल रहा, निषाद समुदाय अब जागरूक हो चुका है, इसलिए वो शायद अब किसी का बंधुआ मजदूर बनना नही चाहता, जिसके पीछे बड़े जिम्मेदार स्वयं निषाद पार्टी अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद है। कसरवल कांड से चर्चा में आए डाक्टर संजय निषाद खुद तो हिट हो गए, पार्टी भी अच्छे लेवल पर आकर खड़ी हो गई, अवसरवादिता की राजनीति के माहिर डॉक्टर संजय निषाद को कभी जाति का ख्याल नही रहा, उन्हे सिर्फ अपने और अपने परिवार से मतलब रहा। पहले सपा से बेटे को गोरखपुर का सांसद बनाया, फिर बीजेपी का घटक दल बनकर बेटे को संतकबीरनगर से सांसद बनाया और जातिगत वोटों की गणित समझा कर बीजेपी के रहमोकरम पर एमएलसी बन सरकार में मंत्री बन गए। जाति को आरक्षण दिलाने के वादे के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वाले डॉक्टर संजय निषाद ने जाति का भला नहीं किया इसलिए शायद अब सजातीय लोग समझ गए हैं, जिसके चलते मेंहदावल विधानसभा क्षेत्र के उन चार सीटों जहां से बीजेपी की हार हुई वहां पर अधिक संख्या में रहने के बाबजूद निषाद वोटरों ने इनका साथ नही दिया। चारों सीटों पर कमल मुरझाया तो इसके पीछे के जबाबदेह सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर संजय निषाद ही है। बीजेपी को इस विषय पर आत्ममंथन की जरूरत है।

सांसद पुत्र और विधायक के साथ रहकर भी मंत्री जी नही बचा सके BJP की लाज

 

संतकबीरनगर जिले में संपन्न हुए नगर निकाय चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए कुछ खास नही रहे। ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने का दावा करने वाले बीजेपी के आकाओं और सहयोगी दल निषाद पार्टी को जनता ने इस चुनाव में तगड़ा झटका दिया है। बीजेपी को जिले में सिर्फ 02 ही सीटों पर जीत मिली है। जिसमे एक पर जीत तो पहले ही तय मानी जा रही थी और दूसरे पर संवेदना के रथ पर सवार उम्मीदवार को जनता ने जीत दिला दी। दक्षिणांचल की दो सीटें जहां बीजेपी के खेमे में गई वहीं उत्तरांचल यानी मेंहदावल की चार सीटों बखिरा, मेंहदावल, बेलहर, धर्मसिंहवा से बीजेपी को बड़ी हार मिली। इन चारो सीटों पर निषाद विरादरी के वोटर्स जीत हार के लिए बहुत मायने रखते थे जिन्हें साधने की जिम्मेदारी बीजेपी ने निषाद पार्टी को सौप रखी थी जिसपर निषाद पार्टी के अध्यक्ष, सरकार में मंत्री डॉक्टर संजय निषाद, उनके पुत्र स्थानीय सांसद प्रवीण निषाद, पार्टी के विधायक अनिल त्रिपाठी खरे नहीं उतरे।  निषाद पार्टी के कोर वोटर्स सपा अथवा बसपा या अन्य दलों के साथ हो चले। खुद को निषाद समुदाय का रहनुमा बताने वाले डॉक्टर संजय निषाद बीजेपी के लिए कुछ नहीं कर सके। सांसद पुत्र और पार्टी विधायक के साथ निषाद बाहुल्य बस्तियों में जाकर उनसे बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने की उनकी अपील काम नही आई जिसके चलते बीजेपी मेंहदावल विधान सभा क्षेत्र की सभी सीटों पर बुरी तरह हारी। निषाद पार्टी के अगुआ की इस विफलता पर बीजेपी को मंथन करना पड़ेगा, क्योंकि नतीजे ये बताने के लिए काफी हैं कि निषाद समुदाय अब डॉक्टर संजय निषाद को घास नहीं डाल रहा, निषाद समुदाय अब जागरूक हो चुका है, इसलिए वो शायद अब किसी का बंधुआ मजदूर बनना नही चाहता, जिसके पीछे बड़े जिम्मेदार स्वयं निषाद पार्टी अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद है। कसरवल कांड से चर्चा में आए डाक्टर संजय निषाद खुद तो हिट हो गए, पार्टी भी अच्छे लेवल पर आकर खड़ी हो गई, अवसरवादिता की राजनीति के माहिर डॉक्टर संजय निषाद को कभी जाति का ख्याल नही रहा, उन्हे सिर्फ अपने और अपने परिवार से मतलब रहा। पहले सपा से बेटे को गोरखपुर का सांसद बनाया, फिर बीजेपी का घटक दल बनकर बेटे को संतकबीरनगर से सांसद बनाया और जातिगत वोटों की गणित समझा कर बीजेपी के रहमोकरम पर एमएलसी बन सरकार में मंत्री बन गए। जाति को आरक्षण दिलाने के वादे के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वाले डॉक्टर संजय निषाद ने जाति का भला नहीं किया इसलिए शायद अब सजातीय लोग समझ गए हैं, जिसके चलते मेंहदावल विधानसभा क्षेत्र के उन चार सीटों जहां से बीजेपी की हार हुई वहां पर अधिक संख्या में रहने के बाबजूद निषाद वोटरों ने इनका साथ नही दिया। चारों सीटों पर कमल मुरझाया तो इसके पीछे के जबाबदेह सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर संजय निषाद ही है। बीजेपी को इस विषय पर आत्ममंथन की जरूरत है।

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