बिड़हाल घाट से लेकर वृद्धाश्रम तक दिखा जिलाधिकारी का संवेदनशील चेहरा…………….
संतकबीरनगर– प्रशासन जब केवल फाइलों तक सीमित न रहकर धरातल पर उतरता है, तो जनता का व्यवस्था पर विश्वास और गहरा हो जाता है। कुछ ऐसा ही उदाहरण पेश किया है जनपद के जिलाधिकारी आलोक कुमार ने। कड़ाके की इस ठंड और हाड़ कंपा देने वाली शीतलहर में जहाँ लोग घरों में दुबक कर बैठे हैं, वहीं डीएम आलोक कुमार कर्तव्य और संवेदनाओं की मशाल लेकर सड़कों पर नजर आ रहे हैं।
उनकी इस सेवा भावना को देख किसी शायर की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आती हैं:……..”धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है, किताबों को हटा कर देखो,
सिर्फ़ पद से ही नहीं मिलता है बड़ापन सबको,
बे-सहारा को कभी सीने से लगा कर देखो।”………..
जिलाधिकारी के सेवा अभियान की शुरुआत बीती रात धनघटा क्षेत्र के बिड़हाल घाट से हुई। यहाँ पाले और कनकनी के बीच तपस्यारत साधु-संतों और जरूरतमंदों के पास जब डीएम खुद कंबल लेकर पहुँचे तो हर किसी का चेहरा खिल उठा। उन्होंने न केवल कंबल बाँटे, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि जिले में कोई भी व्यक्ति खुले आसमान के नीचे ठिठुरने को मजबूर न हो।
रात की गश्त के बाद सुबह जिलाधिकारी सियरा सांथा स्थित वृद्धाश्रम पहुँच गए। यहाँ का नजारा किसी भावुक दृश्य से कम न था। डीएम ने एक-एक बुजुर्ग का हाथ थामकर उनका हाल जाना और उनसे व्यवस्थाओं के बारे में पूछा। बुजुर्गों के सिर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने संचालक को कड़े निर्देश दिए कि भोजन, सफाई और हीटिंग की व्यवस्था में कोई कोताही न बरती जाए।
इसके बाद उन्होंने केरमुआ में निर्माणाधीन वृद्धाश्रम का भी स्थलीय निरीक्षण किया और कार्य की गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया। इस पूरी मुहिम में मुख्य विकास अधिकारी जयकेश त्रिपाठी, तहसीलदार आनंद ओझा और जिला समाज कल्याण अधिकारी महेंद्र कुमार भी कदम से कदम मिलाकर चलते नजर आए।
जिलाधिकारी की इस पहल ने यह साबित कर दिया कि शासन की मंशा केवल आदेश पारित करना नहीं बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सुरक्षा और सम्मान का अहसास कराना भी है। उनकी इस सक्रियता को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि…….”कौन कहता है कि इन्सानियत मर गई है,
ज़रा प्रशासन का ये मानवीय चेहरा तो देखो।”
