रिपोर्ट – कुलदीप मिश्र
संतकबीरनगर– वर्तमान दौर में जहाँ शिक्षा केवल किताबी ज्ञान और ऊंचे अंकों तक सिमटती जा रही है, वहीं डॉ. शुभदा पांडेय एक ऐसी वैचारिक क्रांति का नेतृत्व कर रही हैं जो खेल, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं को शिक्षा का आधार मानती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार और तीन विश्व रिकॉर्ड धारक डॉ. पांडेय का जीवन और उनका लेखन आधुनिक समाज के लिए एक ‘सांस्कृतिक कल्पतरु’ के समान है।डॉ. पांडेय का मानना है कि बालक का सर्वांगीण विकास चारदीवारी के भीतर नहीं, बल्कि खेल के मैदान और प्रकृति की गोद में होता है। उनकी पुस्तक ‘आओ सीखें खेल-खेल में’ इसी सोच का परिणाम है। वे लिखती हैं कि खेल न केवल शरीर को पुष्ट करते हैं, बल्कि बच्चों में सामाजिकता, धैर्य और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना जगाते हैं।
उनका शिक्षा-दर्शन किताबी ‘होमवर्क संस्कृति’ के बजाय ‘अनुभव संस्कृति’ पर जोर देता है। वे आज की फ्लैट संस्कृति और मोबाइल की लत पर चिंता जताते हुए कहती हैं कि जब तक बच्चा मिट्टी से नहीं जुड़ेगा, उसका विकास अधूरा रहेगा।
शुभदा जी की लेखनी में प्रकृति केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र है। ‘स्वर्णमृगी सपनों के पाखी’ जैसी विश्व रिकॉर्ड विजेता कृति में उन्होंने 111 पक्षियों के माध्यम से समाज को आईना दिखाया है। उनकी कविताओं में जब एक ‘बटेर’ दिल्ली के प्रदूषण पर संसद में गुहार लगाने की बात करता है, तो वह पाठकों के मन में पर्यावरण के प्रति गहरी जिम्मेदारी का बोध कराता है।
डॉ. पांडेय ने पूर्वोत्तर भारत की लोक-संस्कृति को हिंदी साहित्य के मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया है। मणिपुर के शर्मीले ‘संगाई हिरण’ से लेकर भूटान की वादियों तक, उनके शब्दों ने भौगोलिक दूरियों को पाट दिया है। उनकी रचनाओं में ब्रह्मपुत्र की लहरें और बिहू की थिरकन उतनी ही आत्मीयता से झलकती है,जितनी कुशीनगर की मिट्टी।
एक नजर डॉ शुभदा की उपलब्धियों पर
पारिवारिक विरासत: स्वतंत्रता सेनानी माता-पिता के संस्कारों की थाती।
अकादमिक शिखर: एम.ए., एम.एड. और पी.एच.डी. के साथ 35 मौलिक पुस्तकों का सृजन।
वैश्विक पहचान: साहित्य और कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठित विश्व रिकॉर्ड्स।
नवाचार: वर्ष 2000 में 365 दिनों तक प्रतिदिन एक नया ‘सूर्य चित्र’ बनाकर कला और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय पेश किया।
अपने पति प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री स्व प्रोफेसर नित्यानंद पांडेय के साथ मिलकर डॉ. शुभदा पांडेय ने शिक्षा जगत में मूल्यों की स्थापना करने का कार्य किया। उनका घोष वाक्य— “राम काज कीन्हे बिनु मोहिं कहाँ विश्राम” ही उनके कर्मठ व्यक्तित्व का प्रमाण है। वे एक ऐसी साहित्यकार हैं जो केवल लिखती नहीं हैं, बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से एक स्वस्थ, सुंदर और शिक्षित समाज का निर्माण करने वाली ‘शिल्पकार’ भी हैं।