

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की गूँज सुनाई देने लगी है। हाल ही में विवादित वेब सीरीज ‘घूसखोर पंडत’ पर बसपा सुप्रीमो मायावती की कड़ी आपत्ति और केंद्र सरकार से प्रतिबंध की मांग ने ब्राह्मण समाज का दिल जीत लिया है। जहाँ एक तरफ भाजपा के दिग्गज नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं मायावती के इस साहसी कदम ने 2027 के विधानसभा चुनावों के समीकरण बदल दिए हैं।
विवादित वेब सीरीज ‘घूसखोर पंडत’ पर बसपा सुप्रीमो मायावती की तीखी प्रतिक्रिया ने न केवल ब्राह्मण समाज के भीतर एक नई हलचल पैदा कर दी है, बल्कि सत्ताधारी दल के रणनीतिकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
मायावती ने बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों में केंद्र सरकार से इस वेब सीरीज पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए कहा है कि किसी भी समाज को ‘जातिसूचक’ शब्दों से अपमानित करना निंदनीय है। उनका यह बयान उस वक्त आया है जब ब्राह्मण समाज के भीतर अपनी छवि को लेकर गहरा रोष व्याप्त था। लखनऊ पुलिस द्वारा इस मामले में FIR दर्ज किए जाने को मायावती ने एक सही कदम करार दिया है, जिसने ब्राह्मण समाज की नाराजगी को एक सशक्त राजनीतिक आवाज दे दी है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात भाजपा के उन दिग्गज ब्राह्मण नेताओं की चुप्पी रही है, जिन्हें समाज अपना रक्षक मानता था।
सोशल मीडिया पर अब यह सवाल तरह तैर रहा है कि जो समाज भाजपा का ‘कोर वोटर’ रहा, उसके अपमान पर अपनों ने ही मुंह क्यों फेर लिया? चर्चाएं तो यहाँ तक हैं कि क्या ब्राह्मण समाज अब मानसिक गुलाम नेताओं को छोड़कर मायावती के रूप में अपना नया और साहसी हितैषी पहचान चुका है। राजनीतिक विश्लेषक इसे 2007 के उस दौर से जोड़कर देख रहे हैं जब ‘हाथी नहीं गणेश है’ के नारे ने यूपी की सत्ता का पूरा नक्शा बदल दिया था। इतिहास गवाह है कि जब-जब दलित और ब्राह्मण एक मंच पर आए हैं, लखनऊ के सिंहासन पर मायावती का कब्जा हुआ है। ‘घूसखोर पंडत’ विवाद ने मायावती को एक बार फिर सवर्णों के रक्षक के रूप में उभरने का वो सुनहरा मौका दे दिया है, जो 2027 में किसी बड़े राजनीतिक ‘चमत्कार’ की पटकथा लिख सकता है। यह महज एक फिल्म का विरोध नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सत्ता के लिए बिछाई गई वो बिसात है, जहाँ एक सही चाल मायावती की किस्मत बदल सकती है। और उन्हें यूपी की सत्ता की चाभी दिला सकती है।