आंधी का विकराल तांडव थमा, बारिश की तेज बूंदें शांत हुईं, लेकिन संतकबीरनगर जिले के सेमरियावां विकास खंड के दर्जनों गांवों की जिंदगी अभी भी सन्नाटे और गहरे अंधेरे के आगोश में कैद थी। कुदरत के इस कहर ने आम जनजीवन को झकझोर कर रख दिया था। टूटे हुए बिजली के खंभे, जमीन पर बिखरे हाई-voltage तार, उखड़े हुए पेड़ और खामोश पड़े पानी के मोटर-पंप उस वीरान सच्चाई को बयां कर रहे थे, जिसे एसी कमरों में बैठकर लोग शायद सिर्फ एक सामान्य ‘बिजली कटौती’ या ‘आंकड़ा’ समझ सकते हैं।
लेकिन इस विकट आपदा और जनजीवन के पूर्ण ठहराव के बीच सेमरियावां के पूर्व ब्लॉक प्रमुख एवं वर्तमान ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि मुमताज अहमद ने जिस राजनीतिक संवेदनशीलता, प्रशासनिक तत्परता और जुझारू सक्रियता का परिचय दिया है उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सत्ता या पद से ऊपर उठकर जनता के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला नेता ही जनहित का असली पहरेदार कहलाता है।
मुशीबत की इस घड़ी मे मुंबई का दौरा छोड़ दौड़े चले आए मुमताज, डीएम के दरबार में उठाई बुलंद आवाज
प्राकृतिक आपदाएं किसी से पूछकर नहीं आतीं, लेकिन वे हर जनप्रतिनिधि की कार्यकुशलता और संवेदनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा जरूर ले जाती हैं। सेमरियावां क्षेत्र जब आंधी-तूफान और बारिश की चपेट में था, तब मुमताज अहमद एक निजी दौरे के सिलसिले में मुंबई में थे। जैसे ही उन्हें फोन पर अपने क्षेत्र के गांवों में तबाही, टूटे बिजली तंत्र और लोगों के अंधेरे में रहने की सूचना मिली, उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपना दौरा बीच में ही रद्द कर दिया। अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं को दरकिनार करते हुए उन्होंने तुरंत क्षेत्र में वापस लौटने का निर्णय लिया और बिना समय गंवाए सीधे जमीन पर उतर आए।
क्षेत्र में कदम रखते ही उन्होंने कागजी बयानबाजी या सोशल मीडिया की सियासत करने के बजाय सीधे प्रशासनिक मोर्चे पर मोर्चा संभाला। उन्होंने जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों से संपर्क किया और जिलाधिकारी को औपचारिक पत्र सौंपकर सेमरियावां के प्रभावित गांवों में युद्धस्तर पर विद्युत आपूर्ति बहाल करने की पुरजोर मांग की। उनके इस त्वरित और कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप का असर यह हुआ कि विद्युत विभाग की सोई हुई कार्यप्रणाली में हरकत आई, टीमों को गांवों में भेजा गया और मरम्मत कार्यों में तेजी लाई गई।
विपक्ष की खामोशी पर उठे गंभीर सवाल: आखिर आपदा के वक्त कहां थे बाकी सियासी सूरमा?
मुमताज अहमद की इस मुखर और जमीन पर दिखने वाली सक्रियता ने सेमरियावां की स्थानीय राजनीति में एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। आज क्षेत्र की चौपालों से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही सवाल गूंज रहा है—जब जनता रोशनी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही थी, तब लंबे-लंबे सियासी दावे करने वाले विपक्षी दलों और अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधियों के चेहरे कहां गायब थे?
क्या विपक्ष की राजनीति अब केवल प्रेस विज्ञप्तियों, बयानों और चुनावी मौसम के भाषणों तक ही सीमित रह गई है? आपदा के इस दौर में जब गांवों के घर अंधेरे में डूबे थे, तब किसी भी विपक्षी दल के नेता ने प्रभावित गांवों का दौरा कर जनता का दर्द जानने, उनकी सुधि लेने या प्रशासन पर दबाव बनाने की जहमत क्यों नहीं उठाई? मुमताज अहमद की यह पहल इस बात का सबसे बड़ा और करारा जवाब है कि जनता के बीच रहने वाला नेता सुख-सुविधाओं का त्याग कर संकट की घड़ी में सबसे आगे खड़ा होता है, जबकि मौकापरस्त लोग केवल तमाशा देखते हैं।
सिर्फ बिजली नहीं, अब किसानों के हक, फसलों के नुकसान और मुआवजे के लिए भी जंग
मुमताज अहमद की यह सक्रियता केवल बिजली के खंभे खड़े करने तक सीमित नहीं है। उन्होंने क्षेत्र के हालात का जायजा लेते हुए यह स्पष्ट किया है कि इस प्राकृतिक आपदा से केवल विद्युत व्यवस्था ही ध्वस्त नहीं हुई है, बल्कि किसानों की खड़ी फसलें, बागवानी, पेड़-पौधे और गरीब परिवारों के कच्चे आशियानों को भी भारी क्षति पहुंची है।इस बात को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने जमीनी स्तर पर एक विशेष टीम का गठन कर दिया है, जो गांव-गांव जाकर वास्तविक और धरातलीय नुकसान का आकलन करेगी.!