
संक्षिप्त परिचय – वर्ष 2004 से राष्ट्रीय सहारा दैनिक अख़बार से बतौर मगहर प्रतिनिधि के रूप मे अपनी सेवाएं देने के साथ दैनिक पायनीयर आदि समाचार संस्थानों मे कार्य अनुभव लेने वाले श्री मिश्र वर्तमान मे वकालत पेशे से जुड़े हुए है…. समय समय पर श्री मिश्र जनहित के मुद्दों को लेकर ख़बर लिखते है और विधिक लड़ाई लड़ पीड़ित को इंसाफ दिलाने के लिए जाने जाते है
पोस्टमार्टम हाउस में नम हुई थी एसपी की आंखें,पत्रकार के बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी उठाकर जीत लिया जनपद का दिल!
वर्दी का रुतबा नहीं,दिल की अमीरी देखिए! दिवंगत पत्रकार के परिवार के लिए फरिश्ता बनकर सामने आए एसपी संदीप कुमार मीना!
जहां पिता का साया उठा,वहाँ खाकी ने थामा हाथ ₹_5.51 लाख की मदद और बेटी की तीन साल की पढ़ाई का उठाया जिम्मा!
कंधों पर सितारे,आंखों में संवेदना और दिल में इंसानियत,एसपी संदीप कुमार मीना की पहल ने खाकी की तस्वीर को बनाया और भी उज्ज्वल!
पोस्टमार्टम हाउस में छलके आंसू, खाकी ने थामा अनाथ होते सपनों का हाथ; एसपी संदीप कुमार मीना की संवेदनशीलता ने जीता जनपद का दिल!
संतकबीरनगर:किसी अधिकारी की पहचान उसके कंधों पर सजे सितारों से नहीं उसके व्यक्तित्व में चमकती इंसानियत से होती है। कुछ अधिकारी अपने पद से पहचाने जाते हैं कुछ अपने फैसलों से और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी पहचान उनके भीतर बसने वाली इंसानियत बन जाती है। पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना ऐसे ही विरले व्यक्तित्व के धनी दिखाई दिए हैं जिनकी वर्दी में अनुशासन की कठोरता तो है लेकिन हृदय में करुणा का अथाह सागर भी लहराता है। उनके चेहरे पर दमकती सौम्यता,मृदुभाषी स्वभाव,संस्कारों से परिपूर्ण व्यवहार और कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा उन्हें विशिष्ट बनाती है। संदीप अर्थात प्रकाश की किरण और मीना उनकी पहचान का हिस्सा है लेकिन उनके कार्यों ने इस नाम को संवेदनशील नेतृत्व की एक अलग पहचान दी है। अपराधियों के लिए कानून का कठोर चेहरा और पीड़ितों के लिए सहानुभूति से भरा हृदय यही उनकी कार्यशैली का अनुपम पक्ष है। उनकी मानवीय संवेदना का सबसे भावुक दृश्य तब सामने आया जब जिले के दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार शोभित पाण्डेय को देखने वह पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे थे। पार्थिव शरीर और उनके पिता को सामने देखकर एसपी की आंखें नम हो गईं गला रुध गया। वह भावुक हो उठे। यह दृश्य किसी सरकारी औपचारिकता का नहीं अपितु एक संवेदनशील इंसान के भीतर उमड़ते दर्द का था। वर्दी की मर्यादा के भीतर धड़कते इस हृदय ने उस दिन मानवता की ऐसी मिसाल पेश की जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं।
शोभित पाण्डेय केवल एक पत्रकार नहीं बल्कि अपनी निर्भीक, निडर लेखनी और निष्पक्ष पत्रकारिता के माध्यम से जनपद की आवाज बने हुए थे। हिन्दुस्तान में क्राइम रिपोर्टर के रूप में सेवाएं देने से पहले वह अमर उजाला में चीफ ब्यूरो की जिम्मेदारी भी निभा चुके थे। उनके असमय चले जाने से पत्रकारिता जगत ने एक कर्मठ साथी खोया और परिवार ने अपने जीवन का सबसे मजबूत सहारा। पिता के बिछड़ने का दर्द बच्चों के लिए कितना गहरा होता है इसे कोई संवेदनशील हृदय ही महसूस कर सकता है। एसपी संदीप कुमार मीना ने इस पीड़ा को केवल सुना नहीं बल्कि परिवार के दरवाजे तक पहुंचकर उसे महसूस किया। उन्होंने दिवंगत पत्रकार के घर जाकर परिजनों को सांत्वना दी और पुलिस परिवार की ओर से 5 लाख 51 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की। लेकिन उनकी संवेदनशीलता यहीं नहीं रुकी। उन्होंने ब्लूमिंग बड्स स्कूल के प्रबंधक से व्यक्तिगत वार्ता कर शोभित पाण्डेय की पुत्री कु० समृद्धि पाण्डेय जो वर्तमान में कक्षा 10 की छात्रा हैं की कक्षा 10 से 12 तक की संपूर्ण फीस माफ कराने की व्यवस्था कराई। इस महत्वपूर्ण पहल के प्रमाण-पत्र भी बेटी को सौंपे गए। स्कूल प्रबंधन ने भी सामाजिक उत्तरदायित्व का परिचय देते हुए इस पुनीत कार्य में सहयोग किया। तीन वर्षों की शिक्षा का आर्थिक बोझ हटाकर एसपी ने समृद्धि के भविष्य के सामने खड़ी एक बड़ी चिंता को दूर करने का प्रयास किया है।दरअसल, 5 लाख 51 हजार रुपये की सहायता और तीन वर्षों की निशुल्क शिक्षा का महत्व केवल आर्थिक आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता। यह उस परिवार के लिए उम्मीद का दीपक है जिसके जीवन में अचानक अंधेरा उतर आया है। पिता की उंगली पकड़कर चलने वाली बेटी को अब उनके बिना अपने सपनों की राह तय करनी है। ऐसे में जब खाकी उसके भविष्य की राह में सहारा बनकर खड़ी हो जाए तो यह संवेदना किसी पुरस्कार या प्रशस्ति-पत्र से कहीं बड़ी हो जाती है। आज पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना की इस पहल की चहुंओर प्रशंसा हो रही है। संतकबीरनगर पुलिस और ब्लूमिंग बड्स स्कूल प्रबंधन की यह साझा पहल समाज के सामने भी एक अनुकरणीय संदेश है कि किसी परिवार की विपत्ति में संवेदनशील संस्थाएं साथ खड़ी हों तो दुख का बोझ कुछ हल्का अवश्य हो सकता है। सच तो यह है कि वर्दी का वास्तविक गौरव अपराधियों में भय पैदा करने के साथ-साथ पीड़ितों के मन में विश्वास जगाने में है। शोभित पाण्डेय लौटकर नहीं आएंगे पिता का साया फिर नहीं मिलेगा लेकिन समृद्धि की आंखों में पलते सपनों को बचाने के लिए बढ़ा यह मददगार हाथ आने वाले कल की नई इबारत लिख सकता है। सलाम उस सोच को उस संस्कार को और उस इंसानियत को जिसने साबित कर दिया कि खाकी केवल कानून की ताकत नहीं जरूरत पड़ने पर किसी टूटते परिवार का संबल भी बन सकती है।