Time in United States now
सत्यमेव टाइम्स में आपका स्वागत है     अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पिछले दिनों 9 मई को पाकिस्तान को कुल 2.4 बिलियन डॉलर की धनराशि स्वीकृत की जिसमें 1 बिलियन डॉलर एक्सटेन्डेड फंड फैसेल्टी EFF के हिस्से के रूप में और 1.4 बिलियन डॉलर रेजेलियन्स एंड सस्टेनेबिलिटी फैसेल्टी के (RSF) के अंतर्गत। लेकिन सवाल इस मदद की टाइमिंग पर उठ रहा है। सवाल ये कि कहीं आईएमएफ इस मदद के जरिये आतंकवाद को बढ़ावा तो नहीं दे रहा। वो भी तब जब पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन ने भारत में अस्थिरता फैलाने के उद्देश्य से जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को गोलीबारी की, जिसमें 26 पर्यटक मारे गये थे। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े संगठन ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने ली थी। हालांकि भारत ने पाकिस्तान को आईएमएफ द्वारा की गई मदद के इस फैसले के बाद आपत्ति भी दर्ज कराई और कहा कि वो इस फैसले पर एक बार फिर से विचार करे। क्योंकि पाकिस्तान वो देश है जिसके तार विश्व में किसी भी देश पर हुए आतंकवादी घटना से जुड़ते हैं। इतना ही नहीं आईएमएफ और विश्व समुदाय को ये नहीं भूलना चाहिये कि पाकिस्तान के वर्तमान डीजी आईएसपीआर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी उस सुल्तान बशीरुद्दीन महमूद का बेटा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित किया गया है। बशीरुद्दीन महमूद, एक पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक था, जिसको कभी पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम में उसकी भूमिका के लिए सराहा गया था। इतना ही नहीं उसने बाद में उम्मा तामीर-ए-नौ (यूटीएन) की स्थापना भी की थी। जिसे अल कायदा और तालिबान की सहायता करने के कारण यूएसए और यूएन ने प्रतिबंधित किया था। उपरोक्त कही गई बातें कोरी कल्पना नहीं है इसका सबूत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में अंकित है। ये बात है अगस्त 2001 की जब 11 सितम्बर 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका पर अलकायदा के हमले से कुछ हफ़्ते पहले, बशीरुद्दीन महमूद और उसका एक सहयोगी, ओसामा बिन लादेन और अयमान अल-ज़वाहिरी से मुलाकात करने के लिए कंधार गए थे। इस दौरान उन्होंने न केवल परमाणु हथियारों के निर्माण की बुनियादी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई बल्कि उसके संभावित प्रभावों और उसके विकास लिये जरूरी संसाधन की रणनीति जैसी सबसे खतरनाक जानकारी से अल कायदा जैसे आतंकी संगठन को बशीरुद्दीन महमूद ने लैस किया। इतना ही नहीं बशीरुद्दीन महमूद के संगठन यूटीएन ने तालिबान के साथ भी मिलकर काम किया। बशीरुद्दीन महमूद के संबंध अल राशिद ट्रस्ट और जैश-ए-मोहम्मद के साथ भी थे, और दोनों ही आतंकवादी संगठनों के नाम मासूमों के खून से सने हुए हैं। बशीरुद्दीन महमूद के ऊपर ये भी आरोप है कि उसने तालिबान के पुनःनिर्माण के प्रयासों को आर्थिक मदद भी की जिसके लिये उसकी तालिबान के नेता मुल्ला उमर से कई बार मुलाकात हुई। कई लोगों का मानना है कि बशीरुद्दीन महमूद वास्तव में पाकिस्तान में तालिबान के एक राजदूत के तौर पर काम कर रहा था। इन तमाम परिस्थितियों और दागदार इतिहास से जुड़े आदमी का बेटा पाकिस्तान की सेना का सार्वजनिक चेहरा कैसे बन सकता है? इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात: आईएमएफ, जिसका काम आर्थिक अखंडता और वैश्विक स्थिरता की रक्षा करना है, ऐसे खतरनाक संगठनों की जांच किए बिना वित्तीय सहायता को मंजूरी कैसे दे सकता है? भारत हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ काम करता रहा है और किसी भी देश को विकास की गतिविधियां जारी रखने के लिये सहायता दिए जाने के खिलाफ नहीं है, लेकिन पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों से अपने घर में आतंक के सरपरस्तों और संगठनों को शरण दे रखी है और वो भारत समेत विश्वभर के कई देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए लगातार खतरा बने हुये हैं। ऐसे में आईएमएफ द्वारा इस तरह का वित्तपोषण निहायत ही बचकाना है और सोचने पर मजबूर करता है। IMF को इस तरह के निर्णय लेने से पहले उसके व्यापक परिणामों के बारे में समझना होगा और ये भी समझना होगा कि जवाबदेही और संरचनात्मक सुधार की मांग किए बिना पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देने के निर्णय से कहीं ऐसी प्रणाली को बढ़ावा तो नहीं मिल रहा है जिसमें चरमपंथी विरासत वाले विचारों का प्रभाव हो। ये केवल वंशानुक्रम का मामला नहीं है बल्कि ये ऐसी कट्टरपंथी विरासत के बारे में है जिसका परिणाम पूरे विश्व के देशों को कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ा है। जिसकी कीमत उन निर्दोष नागरिकों को चुकानी पड़ी है जिनका इन चरमपंथियों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। एक बड़े अखबार में छपी खबर के अनुसार भारत ने आईएमएफ के अधिकारियों के सामने वो आंकड़ें भी रखे जिसमें पता चलता है कि जब भी आईएमएफ ने पाकिस्तान को वित्तीय सहायता जारी की है तब तब पाकिस्तान का रक्षा बजट बढ़ा है। इतना है नहीं वो अखबार सूत्रों के हवाले से ये भी लिखता है कि “पाकिस्तान के हथियार आयात में 1980 से 2023 तक नाटकीय रूप से औसतन 20% से ज्यादा की वृद्धि हुई है, उन वर्षों में जब उसे आईएमएफ से धन प्राप्त हुआ बजाय उन वर्षों के जब उसे ये प्राप्त नहीं हुआ।” इतना ही नहीं हाल ही में अल कायदा (AQIS) के द्वारा भारत के खिलाफ पाकिस्तान को समर्थन करने की धमकियाँ मिलना इस बात का संकेत है कि आतंकवादी समूहों और पाकिस्तान के अंदर राजनैतिक और अन्य तमाम संगठनों के बीच वैचारिक गठबंधन कितना ठोस है और भारत की उस बात को पुख्ता करता है जिसमें समय समय पर विश्वमंच में सभी देशों को आतंक के खिलाफ एकजुट करने का आह्वान भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। ऐसे में आईएमएफ को यह सुनिश्चित करना होगा कि आर्थिक सहायता सशर्त हो साथ ही उसकी जवाबदेही भी तय हो जिससे वास्तविक वित्तीय सुधारों को बल मिले ना कि ऐसी परंपरा बन जाये कि जवाबदेही और संरचनात्मक सुधार की मांग किए बिना ऐसे लोगों को सहायता मिले जो मानवता के खिलाफ षड़यंन्त्र करते हैं और जिनके हाथ मासूमों के खून से सने हुए हैं। वैश्विक समुदाय को अब ये तय करना है कि वो अब ऐसी शासन व्यवस्थाओं को वित्तपोषित करने का जोखिम नहीं उठा सकता जो कट्टरपंथ से लड़ने का दावा तो करते हैं लेकिन पीठ पीछे उन्हीं के साथ गलबहियां करते हैं। अब समय है कि आईएमएफ इस सवाल पर काम करे कि क्या यह आर्थिक सुधार और पाकिस्तान की मदद कहीं अनजाने में आतंक के बुनियादी ढांचे को वित्तपोषित तो नहीं कर रहा है?   (लेखक - मोहित मौर्य - विदेश नीति मामलों के मर्मज्ञ ज्ञाता है)

पाकिस्तान को आईएमएफ की फंडिंग से फले फूलेगा आतंकवाद

 

 

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पिछले दिनों 9 मई को पाकिस्तान को कुल 2.4 बिलियन डॉलर की धनराशि स्वीकृत की जिसमें 1 बिलियन डॉलर एक्सटेन्डेड फंड फैसेल्टी EFF के हिस्से के रूप में और 1.4 बिलियन डॉलर रेजेलियन्स एंड सस्टेनेबिलिटी फैसेल्टी के (RSF) के अंतर्गत। लेकिन सवाल इस मदद की टाइमिंग पर उठ रहा है। सवाल ये कि कहीं आईएमएफ इस मदद के जरिये आतंकवाद को बढ़ावा तो नहीं दे रहा। वो भी तब जब पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन ने भारत में अस्थिरता फैलाने के उद्देश्य से जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को गोलीबारी की, जिसमें 26 पर्यटक मारे गये थे। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े संगठन ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने ली थी।
हालांकि भारत ने पाकिस्तान को आईएमएफ द्वारा की गई मदद के इस फैसले के बाद आपत्ति भी दर्ज कराई और कहा कि वो इस फैसले पर एक बार फिर से विचार करे। क्योंकि पाकिस्तान वो देश है जिसके तार विश्व में किसी भी देश पर हुए आतंकवादी घटना से जुड़ते हैं। इतना ही नहीं आईएमएफ और विश्व समुदाय को ये नहीं भूलना चाहिये कि पाकिस्तान के वर्तमान डीजी आईएसपीआर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी उस सुल्तान बशीरुद्दीन महमूद का बेटा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित किया गया है। बशीरुद्दीन महमूद, एक पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक था, जिसको कभी पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम में उसकी भूमिका के लिए सराहा गया था। इतना ही नहीं उसने बाद में उम्मा तामीर-ए-नौ (यूटीएन) की स्थापना भी की थी। जिसे अल कायदा और तालिबान की सहायता करने के कारण यूएसए और यूएन ने प्रतिबंधित किया था।
उपरोक्त कही गई बातें कोरी कल्पना नहीं है इसका सबूत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में अंकित है। ये बात है अगस्त 2001 की जब 11 सितम्बर 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका पर अलकायदा के हमले से कुछ हफ़्ते पहले, बशीरुद्दीन महमूद और उसका एक सहयोगी, ओसामा बिन लादेन और अयमान अल-ज़वाहिरी से मुलाकात करने के लिए कंधार गए थे। इस दौरान उन्होंने न केवल परमाणु हथियारों के निर्माण की बुनियादी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई बल्कि उसके संभावित प्रभावों और उसके विकास लिये जरूरी संसाधन की रणनीति जैसी सबसे खतरनाक जानकारी से अल कायदा जैसे आतंकी संगठन को बशीरुद्दीन महमूद ने लैस किया। इतना ही नहीं बशीरुद्दीन महमूद के संगठन यूटीएन ने तालिबान के साथ भी मिलकर काम किया। बशीरुद्दीन महमूद के संबंध अल राशिद ट्रस्ट और जैश-ए-मोहम्मद के साथ भी थे, और दोनों ही आतंकवादी संगठनों के नाम मासूमों के खून से सने हुए हैं।
बशीरुद्दीन महमूद के ऊपर ये भी आरोप है कि उसने तालिबान के पुनःनिर्माण के प्रयासों को आर्थिक मदद भी की जिसके लिये उसकी तालिबान के नेता मुल्ला उमर से कई बार मुलाकात हुई। कई लोगों का मानना है कि बशीरुद्दीन महमूद वास्तव में पाकिस्तान में तालिबान के एक राजदूत के तौर पर काम कर रहा था। इन तमाम परिस्थितियों और दागदार इतिहास से जुड़े आदमी का बेटा पाकिस्तान की सेना का सार्वजनिक चेहरा कैसे बन सकता है? इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात: आईएमएफ, जिसका काम आर्थिक अखंडता और वैश्विक स्थिरता की रक्षा करना है, ऐसे खतरनाक संगठनों की जांच किए बिना वित्तीय सहायता को मंजूरी कैसे दे सकता है?
भारत हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ काम करता रहा है और किसी भी देश को विकास की गतिविधियां जारी रखने के लिये सहायता दिए जाने के खिलाफ नहीं है, लेकिन पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों से अपने घर में आतंक के सरपरस्तों और संगठनों को शरण दे रखी है और वो भारत समेत विश्वभर के कई देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए लगातार खतरा बने हुये हैं। ऐसे में आईएमएफ द्वारा इस तरह का वित्तपोषण निहायत ही बचकाना है और सोचने पर मजबूर करता है।
IMF को इस तरह के निर्णय लेने से पहले उसके व्यापक परिणामों के बारे में समझना होगा और ये भी समझना होगा कि जवाबदेही और संरचनात्मक सुधार की मांग किए बिना पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देने के निर्णय से कहीं ऐसी प्रणाली को बढ़ावा तो नहीं मिल रहा है जिसमें चरमपंथी विरासत वाले विचारों का प्रभाव हो। ये केवल वंशानुक्रम का मामला नहीं है बल्कि ये ऐसी कट्टरपंथी विरासत के बारे में है जिसका परिणाम पूरे विश्व के देशों को कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ा है। जिसकी कीमत उन निर्दोष नागरिकों को चुकानी पड़ी है जिनका इन चरमपंथियों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
एक बड़े अखबार में छपी खबर के अनुसार भारत ने आईएमएफ के अधिकारियों के सामने वो आंकड़ें भी रखे जिसमें पता चलता है कि जब भी आईएमएफ ने पाकिस्तान को वित्तीय सहायता जारी की है तब तब पाकिस्तान का रक्षा बजट बढ़ा है। इतना है नहीं वो अखबार सूत्रों के हवाले से ये भी लिखता है कि “पाकिस्तान के हथियार आयात में 1980 से 2023 तक नाटकीय रूप से औसतन 20% से ज्यादा की वृद्धि हुई है, उन वर्षों में जब उसे आईएमएफ से धन प्राप्त हुआ बजाय उन वर्षों के जब उसे ये प्राप्त नहीं हुआ।”
इतना ही नहीं हाल ही में अल कायदा (AQIS) के द्वारा भारत के खिलाफ पाकिस्तान को समर्थन करने की धमकियाँ मिलना इस बात का संकेत है कि आतंकवादी समूहों और पाकिस्तान के अंदर राजनैतिक और अन्य तमाम संगठनों के बीच वैचारिक गठबंधन कितना ठोस है और भारत की उस बात को पुख्ता करता है जिसमें समय समय पर विश्वमंच में सभी देशों को आतंक के खिलाफ एकजुट करने का आह्वान भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था।
ऐसे में आईएमएफ को यह सुनिश्चित करना होगा कि आर्थिक सहायता सशर्त हो साथ ही उसकी जवाबदेही भी तय हो जिससे वास्तविक वित्तीय सुधारों को बल मिले ना कि ऐसी परंपरा बन जाये कि जवाबदेही और संरचनात्मक सुधार की मांग किए बिना ऐसे लोगों को सहायता मिले जो मानवता के खिलाफ षड़यंन्त्र करते हैं और जिनके हाथ मासूमों के खून से सने हुए हैं। वैश्विक समुदाय को अब ये तय करना है कि वो अब ऐसी शासन व्यवस्थाओं को वित्तपोषित करने का जोखिम नहीं उठा सकता जो कट्टरपंथ से लड़ने का दावा तो करते हैं लेकिन पीठ पीछे उन्हीं के साथ गलबहियां करते हैं। अब समय है कि आईएमएफ इस सवाल पर काम करे कि क्या यह आर्थिक सुधार और पाकिस्तान की मदद कहीं अनजाने में आतंक के बुनियादी ढांचे को वित्तपोषित तो नहीं कर रहा है?

 

(लेखक – मोहित मौर्य – विदेश नीति मामलों के मर्मज्ञ ज्ञाता है)

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