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आज जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा खुशियों के त्योहार ईद-उल-फितर की तैयारी में जुटा है, तब मध्य-पूर्व के आसमान से उल्लास की जगह बारूद की गंध आ रही है। विडंबना देखिए कि जिस त्योहार का संदेश शांति, भाईचारा और मानवता है, वही आज इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते त्रिकोणीय तनाव और युद्ध की विभीषिका के साये में सिसक रहा है। हालिया सैन्य टकरावों और रणनीतिक हमलों ने न केवल कूटनीतिक सीमाओं को लांघा है, बल्कि आम इंसान की आस्था और उत्सव के अधिकार को भी बंधक बना लिया है। पिछले कुछ हफ्तों में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ती सीधी जंग ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। अमेरिका की सक्रिय भागीदारी और सैन्य हस्तक्षेप ने इस आग में घी डालने का काम किया है। जहाँ एक ओर उन्नत मिसाइलें और ड्रोन सीमाओं को रौंद रहे हैं, वहीं दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक रास्तों की बंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। तेल की बढ़ती कीमतों और रसद की कमी ने इस बार की ईद को आर्थिक रूप से भी बोझिल बना दिया है। खाड़ी देशों से लेकर लेबनान और गाजा तक, इस बार ईद की रौनक गायब है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में, जहाँ ईद पर भव्य आयोजन होते थे, वहां अब सुरक्षा अलर्ट और मिसाइल डिफेंस सिस्टम की गूँज है। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से सामूहिक खुले मैदानों की नमाज को मस्जिदों के भीतर तक सीमित कर दिया है। बच्चों के लिए नए कपड़ों और मिठाइयों की जगह, अब परिवारों की प्राथमिकता सुरक्षित बंकर और राशन जुटाना बन गई है। कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता; यह केवल विनाश और नफरत की नई फसल बोता है। इस नाजुक मोड़ पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। ईद का यह अवसर केवल मुस्लिम जगत के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक मौका होना चाहिए था कि युद्ध विराम की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं।इजराइल, ईरान और अमेरिका को यह समझना होगा कि उनके बीच की यह 'ईगो की जंग' निर्दोष नागरिकों की खुशियों की बलि ले रही है। अगर दुनिया के नेता वास्तव में शांति के पक्षधर हैं, तो उन्हें इस पवित्र त्योहार की गरिमा का सम्मान करते हुए हथियारों को खामोश करना चाहिए। मानवता को आज मिसाइलों की नहीं, बल्कि मरहम की जरूरत है। उम्मीद है कि अगली सुबह जब सूरज उगे, तो वह युद्ध की राख नहीं बल्कि अमन का पैगाम लेकर आए।

बारूद के साये में ईद: जब इबादत पर भारी पड़ी सियासत

आज जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा खुशियों के त्योहार ईद-उल-फितर की तैयारी में जुटा है, तब मध्य-पूर्व के आसमान से उल्लास की जगह बारूद की गंध आ रही है। विडंबना देखिए कि जिस त्योहार का संदेश शांति, भाईचारा और मानवता है, वही आज इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते त्रिकोणीय तनाव और युद्ध की विभीषिका के साये में सिसक रहा है। हालिया सैन्य टकरावों और रणनीतिक हमलों ने न केवल कूटनीतिक सीमाओं को लांघा है, बल्कि आम इंसान की आस्था और उत्सव के अधिकार को भी बंधक बना लिया है। पिछले कुछ हफ्तों में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ती सीधी जंग ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। अमेरिका की सक्रिय भागीदारी और सैन्य हस्तक्षेप ने इस आग में घी डालने का काम किया है। जहाँ एक ओर उन्नत मिसाइलें और ड्रोन सीमाओं को रौंद रहे हैं, वहीं दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक रास्तों की बंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। तेल की बढ़ती कीमतों और रसद की कमी ने इस बार की ईद को आर्थिक रूप से भी बोझिल बना दिया है। खाड़ी देशों से लेकर लेबनान और गाजा तक, इस बार ईद की रौनक गायब है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में, जहाँ ईद पर भव्य आयोजन होते थे, वहां अब सुरक्षा अलर्ट और मिसाइल डिफेंस सिस्टम की गूँज है। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से सामूहिक खुले मैदानों की नमाज को मस्जिदों के भीतर तक सीमित कर दिया है। बच्चों के लिए नए कपड़ों और मिठाइयों की जगह, अब परिवारों की प्राथमिकता सुरक्षित बंकर और राशन जुटाना बन गई है। कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता; यह केवल विनाश और नफरत की नई फसल बोता है। इस नाजुक मोड़ पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। ईद का यह अवसर केवल मुस्लिम जगत के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक मौका होना चाहिए था कि युद्ध विराम की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं।इजराइल, ईरान और अमेरिका को यह समझना होगा कि उनके बीच की यह ‘ईगो की जंग’ निर्दोष नागरिकों की खुशियों की बलि ले रही है। अगर दुनिया के नेता वास्तव में शांति के पक्षधर हैं, तो उन्हें इस पवित्र त्योहार की गरिमा का सम्मान करते हुए हथियारों को खामोश करना चाहिए। मानवता को आज मिसाइलों की नहीं, बल्कि मरहम की जरूरत है। उम्मीद है कि अगली सुबह जब सूरज उगे, तो वह युद्ध की राख नहीं बल्कि अमन का पैगाम लेकर आए।

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