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दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर इस समय बारूद की गंध छाई हुई है। कभी अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी पर मिठाइयां बांटने वाला पाकिस्तान आज उसी तालिबान की गोलियों और रॉकेटों का सामना कर रहा है। डूरंड लाइन पर छिड़ी यह जंग केवल दो देशों के बीच सीमा विवाद नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की उस 'छद्म युद्ध' नीति की विफलता का प्रमाण है जिसने दशकों तक पूरे क्षेत्र को अस्थिर रखा। फरवरी 2026 में पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा अफगान सीमा के भीतर किए गए हमलों और उसके जवाब में तालिबान द्वारा सीमा चौकियों को निशाना बनाने की घटनाओं ने इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। पाकिस्तान का आरोप है कि काबुल की सरजमीं का इस्तेमाल 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) द्वारा उसके खिलाफ किया जा रहा है, जबकि तालिबान का स्पष्ट रुख है कि वे किसी भी देश की गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे। इस भीषण संघर्ष के बीच भारत की भूमिका एक 'संयमित शक्ति' और 'विश्वसनीय मित्र' के रूप में उभरी है। नई दिल्ली ने इस विवाद में सैन्य हस्तक्षेप के बजाय मानवीय और रणनीतिक कूटनीति को प्राथमिकता दी है। भारत का यह रुख कि वह अफगानिस्तान की संप्रभुता का सम्मान करता है, अफगान जनता के बीच उसकी लोकप्रियता को और बढ़ा रहा है। जहाँ एक तरफ पाकिस्तान ने अपनी सीमाएं सील कर अफगान व्यापार को चोट पहुँचाई है, वहीं भारत ने चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान को दुनिया से जोड़ने का वैकल्पिक रास्ता प्रदान किया है। भारत की मानवीय सहायता, जिसमें दवाइयां और अनाज शामिल हैं, बिना किसी राजनीतिक शर्त के काबुल पहुँच रही है, जो पाकिस्तान के 'धार्मिक कार्ड' के मुकाबले भारत की 'सॉफ्ट पावर' को कहीं अधिक प्रभावी बना रही है। रणनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो पाकिस्तान का दो मोर्चों (भारत और अफगानिस्तान) पर उलझना भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। पाकिस्तान की 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' यानी अफगानिस्तान को अपने पिछवाड़े के रूप में इस्तेमाल करने की नीति अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। अब पाकिस्तान खुद अपनी ही पश्चिमी सीमा पर असुरक्षित महसूस कर रहा है, जिससे कश्मीर सीमा पर उसकी घुसपैठ कराने की क्षमता काफी कम हुई है। भारत के लिए यह समय मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने और अफगानिस्तान के बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाकर अपनी पैठ मजबूत करने का है। यदि भारत अपनी आर्थिक और विकासपरक नीतियों को इसी तरह जारी रखता है, तो वह न केवल पाकिस्तान के प्रभाव को न्यूनतम कर पाएगा, बल्कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में एक अनिवार्य वैश्विक खिलाड़ी बनकर उभरेगा। #afganist#Pakistan#india#afganvspak

डूरंड लाइन का रणक्षेत्र: #पाकिस्तान की विफलता और भारत के लिए उभरते कूटनीतिक द्वार

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर इस समय बारूद की गंध छाई हुई है। कभी अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी पर मिठाइयां बांटने वाला पाकिस्तान आज उसी तालिबान की गोलियों और रॉकेटों का सामना कर रहा है। डूरंड लाइन पर छिड़ी यह जंग केवल दो देशों के बीच सीमा विवाद नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की उस ‘छद्म युद्ध’ नीति की विफलता का प्रमाण है जिसने दशकों तक पूरे क्षेत्र को अस्थिर रखा। फरवरी 2026 में पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा अफगान सीमा के भीतर किए गए हमलों और उसके जवाब में तालिबान द्वारा सीमा चौकियों को निशाना बनाने की घटनाओं ने इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। पाकिस्तान का आरोप है कि काबुल की सरजमीं का इस्तेमाल ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ (TTP) द्वारा उसके खिलाफ किया जा रहा है, जबकि तालिबान का स्पष्ट रुख है कि वे किसी भी देश की गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे।
इस भीषण संघर्ष के बीच भारत की भूमिका एक ‘संयमित शक्ति’ और ‘विश्वसनीय मित्र’ के रूप में उभरी है। नई दिल्ली ने इस विवाद में सैन्य हस्तक्षेप के बजाय मानवीय और रणनीतिक कूटनीति को प्राथमिकता दी है। भारत का यह रुख कि वह अफगानिस्तान की संप्रभुता का सम्मान करता है, अफगान जनता के बीच उसकी लोकप्रियता को और बढ़ा रहा है। जहाँ एक तरफ पाकिस्तान ने अपनी सीमाएं सील कर अफगान व्यापार को चोट पहुँचाई है, वहीं भारत ने चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान को दुनिया से जोड़ने का वैकल्पिक रास्ता प्रदान किया है। भारत की मानवीय सहायता, जिसमें दवाइयां और अनाज शामिल हैं, बिना किसी राजनीतिक शर्त के काबुल पहुँच रही है, जो पाकिस्तान के ‘धार्मिक कार्ड’ के मुकाबले भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को कहीं अधिक प्रभावी बना रही है।
रणनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो पाकिस्तान का दो मोर्चों (भारत और अफगानिस्तान) पर उलझना भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। पाकिस्तान की ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ यानी अफगानिस्तान को अपने पिछवाड़े के रूप में इस्तेमाल करने की नीति अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। अब पाकिस्तान खुद अपनी ही पश्चिमी सीमा पर असुरक्षित महसूस कर रहा है, जिससे कश्मीर सीमा पर उसकी घुसपैठ कराने की क्षमता काफी कम हुई है। भारत के लिए यह समय मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने और अफगानिस्तान के बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाकर अपनी पैठ मजबूत करने का है। यदि भारत अपनी आर्थिक और विकासपरक नीतियों को इसी तरह जारी रखता है, तो वह न केवल पाकिस्तान के प्रभाव को न्यूनतम कर पाएगा, बल्कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में एक अनिवार्य वैश्विक खिलाड़ी बनकर उभरेगा।
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