मध्य पूर्व के आसमान में मंडराते लड़ाकू विमानों और इजराइल-ईरान के बीच छिड़ी सीधी जंग ने गल्फ देशों को एक ऐसी दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ शांति का मुखौटा पहनना उनकी मजबूरी भी है और सबसे बड़ी रणनीति भी। वाशिंगटन और तेल अवीव की नजरें जहाँ ईरान के परमाणु ठिकानों पर टिकी हैं, वहीं रियाद, अबू धाबी और मस्कट के बंद कमरों में एक अलग ही फिल्म चल रही है। सऊदी अरब और यूएई जैसे देश सार्वजनिक मंचों पर संघर्ष विराम की अपील कर रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के ‘थाड’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखते हुए भी ईरान को यह भरोसा दिला रहे हैं कि उनकी जमीन का इस्तेमाल हमले के लिए नहीं होगा। इस राजनीतिक खेल में सबसे रोमांचक भूमिका ओमान और कतर की है, जो आधी रात को मस्कट की गलियों में ईरानी दूतों के साथ गुप्त बैठकें कर रहे हैं ताकि युद्ध की आंच उनके तेल के कुओं तक न पहुँचे। यह एक ऐसा खतरनाक संतुलन है जहाँ एक तरफ अमेरिका का दबाव है कि वे पूरी तरह उसके साथ आएं, और दूसरी तरफ ईरान की सीधी धमकी है कि यदि किसी भी अरब देश ने इजराइल को रास्ता दिया, तो सबसे पहले उनके बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जाएगा। इस त्रिकोणीय संघर्ष के बीच गल्फ देशों की असली रणनीति ‘सक्रिय तटस्थता’ की है, जिसमें वे इजरायली खुफिया जानकारी का उपयोग तो कर रहे हैं लेकिन आधिकारिक तौर पर ईरान के साथ अपने कूटनीतिक चैनल खुले रखे हुए हैं। इसी बीच दुबई के वित्तीय गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि कुछ गल्फ देश युद्ध से होने वाली तेल की कीमतों में उछाल का फायदा उठाने की तैयारी में हैं, जबकि साथ ही वे एक ‘फॉल्स फ्लैग’ ऑपरेशन के डर से भी सहमे हुए हैं जो उन्हें जबरन इस युद्ध का हिस्सा बना सकता है। कुल मिलाकर, गल्फ देशों के लिए यह युद्ध केवल दो देशों की दुश्मनी नहीं, बल्कि उनके अपने अस्तित्व और आने वाले दशकों की आर्थिक सत्ता को बचाए रखने की एक ऐसी जद्दोजहद है जिसमें एक भी गलत कदम पूरे क्षेत्र को राख में तब्दील कर सकता है, और यही कारण है कि वे इस महायुद्ध के बीच चुपचाप अपनी बिसात बिछा रहे हैं।