दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर आज वैसी ही हलचल दिखाई दे रही है जैसी 1971 के बांग्लादेश युद्ध से ठीक पहले महसूस की गई थी! पाकिस्तान आज अपने इतिहास के सबसे गहरे अस्तित्वगत संकट से गुजर रहा है। एक तरफ उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और विदेशी कर्ज का बोझ असहनीय हो चुका है, वहीं अफगानिस्तान के साथ उसकी पश्चिमी सीमा पर छिड़ी भीषण जंग ने पाकिस्तानी सेना की चूलें हिला दी हैं। पाकिस्तान इस वक्त आर्थिक बदहाली, तालिबानी हमलों और आंतरिक विद्रोह के तीन मोर्चों पर एक साथ हार रहा है, जो भारत के लिए 1947 की ऐतिहासिक भूलों को सुधारने का एक ‘गोल्डन विंडो’ खोलता दिख रहा है। विशेष रूप से ब्लूचिस्तान में जिस तरह का जन-आक्रोश फूट रहा है, वह 1971 के पूर्वी पाकिस्तान के विद्रोह की याद दिलाता है जहाँ बलूच नागरिक अपने संसाधनों की लूट और सैन्य अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस समय अपनी ‘रणनीतिक धैर्य’ की नीति को त्यागकर एक निर्णायक प्रहार करता है, तो न केवल POK की ‘घर वापसी’ सुनिश्चित की जा सकती है, बल्कि ब्लूचिस्तान को स्वतंत्र कराकर पाकिस्तान को भौगोलिक रूप से आधा किया जा सकता है। POK के भीतर भी जनता अब आटे की किल्लत और बिजली के भारी बिलों से त्रस्त होकर भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है, जो भारतीय संसद के उस पुराने संकल्प को पूरा करने का सबसे अनुकूल समय है जिसमें POK को वापस लेने की बात कही गई थी। अफगानिस्तान की ओर से मिल रहे सैन्य दबाव और पाकिस्तान के भीतर बढ़ते गृहयुद्ध जैसे हालात ने भारत का काम आसान कर दिया है क्योंकि पाकिस्तानी सेना अब एक साथ कई मोर्चों पर लड़ने में सक्षम नहीं रह गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आज भारत की साख इतनी मजबूत है कि वह चीन और अमेरिका जैसे देशों के संभावित कूटनीतिक दबाव को झेलने की शक्ति रखता है, जबकि अरब जगत के साथ भारत के प्रगाढ़ संबंध पाकिस्तान के ‘इस्लामिक कार्ड’ को पूरी तरह बेअसर कर चुके हैं। इतिहास गवाह है कि अवसर हमेशा के लिए नहीं ठहरते और वर्तमान वैश्विक परिस्थितियाँ पुकार-पुकार कर कह रही हैं कि मोदी सरकार के पास दक्षिण एशिया का भूगोल बदलकर एक ‘अखंड’ शांति की नींव रखने का यह सबसे स्वर्णिम और साहसिक समय है।