Time in United States now
सत्यमेव टाइम्स में आपका स्वागत है   आज के दौर में सूचना के आदान-प्रदान के तरीकों ने एक ऐसी करवट ली है, जिसने सदियों पुरानी मीडिया व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। कभी 'चौथा स्तंभ' कहे जाने वाले अखबार और टीवी चैनल्स आज अपनी साख और प्रभाव बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया एक ऐसे 'सुपर प्लेटफॉर्म' के रूप में उभरा है जहाँ सत्ता का गलियारा और जनता की आवाज़ एक ही धरातल पर आकर मिल गए हैं। सियासत का नया ठिकाना: सोशल मीडिया बना नेताओं का 'कवच' और 'हथियार' भारतीय राजनीति में अब रैलियों की भीड़ से ज्यादा 'ट्रेंड्स' और 'व्यूज' की अहमियत होने लगी है। चाहे भाजपा की संगठित डिजिटल सेना हो, कांग्रेस का बदलता नैरेटिव हो, या सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों की अपनी मौजूदगी—सभी ने अब सोशल मीडिया की शरण ले ली है। नेताओं के लिए अब किसी बड़े मीडिया हाउस के संपादक का मोहताज होना जरूरी नहीं रहा। एक 'एक्स' (ट्विटर) पोस्ट, एक फेसबुक लाइव या इंस्टाग्राम रील के जरिए नेता सीधे अपने मतदाताओं से संवाद कर रहे हैं। उभरते हुए युवा नेताओं के लिए तो सोशल मीडिया एक वरदान साबित हुआ है, जहाँ बिना भारी चुनावी बजट के भी वे अपनी विचारधारा को लाखों लोगों तक पहुँचा पा रहे हैं। निजी डिजिटल चैनलों का उदय और दिग्गज पत्रकारों की 'घर वापसी' इस डिजिटल लहर ने मीडिया के स्थापित ढांचों को ध्वस्त कर दिया है। आज स्थिति यह है कि कई बड़े और प्रतिष्ठित टीवी चैनलों के एंकरों ने स्टूडियो की चकाचौंध छोड़कर अपने निजी यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज खोल लिए हैं। अजीत अंजुम, अभिसार शर्मा, अभिषेक उपाध्याय जैसे अनुभवी पत्रकारों ने यह साबित कर दिया है कि पत्रकारिता किसी की मोहताज नहीं होती। ये पत्रकार अब किसी कॉर्पोरेट दबाव या चैनल की पॉलिसी से मुक्त होकर तीखे सवाल पूछ रहे हैं। वहीं, ध्रुव राठी जैसे 'न्यू-एज' कंटेंट क्रिएटर्स ने जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को इतनी सरलता से पेश किया है कि उनके व्यूज मुख्यधारा के चैनलों की टीआरपी (TRP) को कई गुना पीछे छोड़ रहे हैं। यह 'डिजिटल एंकरिंग' अब सीधे तौर पर स्थापित न्यूज़ चैनलों की विश्वसनीयता और उनकी कार्यप्रणाली को चुनौती दे रही है। अखबारों की घटती बिक्री और टीआरपी का संकट एक समय था जब सुबह की चाय के साथ अखबार का इंतजार होता था, लेकिन अब नोटिफिकेशन की घंटी खबरों का आगाज़ करती है। डिजिटल एक्सेसिबिलिटी के कारण अखबारों की प्रसार संख्या (Circulation) में भारी गिरावट आई है। विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा अब प्रिंट और टीवी से शिफ्ट होकर डिजिटल विज्ञापनों की ओर जा रहा है। न्यूज़ चैनलों की हालत और भी चिंताजनक है। 'शोर-शराबे' वाली डिबेट्स और 'सनसनीखेज' खबरों से ऊब चुके दर्शक अब संतुलित और गहराई वाली जानकारी के लिए यूट्यूब और स्वतंत्र पोर्टल्स का रुख कर रहे हैं। टीआरपी की इस कमी ने न्यूज़ चैनलों को अपनी प्रासंगिकता बचाने के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया है। सूचना के लोकतंत्रीकरण का नया युग  सोशल मीडिया ने सूचना का 'लोकतंत्रीकरण' कर दिया है। अब खबर वह नहीं है जिसे कोई संपादक तय करे, बल्कि खबर वह है जिसे जनता देखना और साझा करना चाहती है। डिजिटल पत्रकारिता का यह दौर न केवल राजनीति के लिए नया द्वार खोल रहा है, बल्कि मीडिया जगत को भी यह आइना दिखा रहा है कि अंततः जनता 'कंटेंट' और 'सच' की ही पक्षधर होती है। आने वाले समय में वही टिका रहेगा जो तकनीक के साथ अपनी साख और तटस्थता को बचाए रख पाएगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भविष्य 'डिजिटल' है और इसकी कमान अब सीधे जनता के हाथों में है। [caption id="attachment_27387" align="alignnone" width="300"] अजय श्रीवास्तव (सम्पादक -सत्यमेव टाइम्स )[/caption]  

डिजिटल क्रांति: सोशल मीडिया की शरण में सियासत और हाशिए पर मुख्यधारा का मीडिया

 

आज के दौर में सूचना के आदान-प्रदान के तरीकों ने एक ऐसी करवट ली है, जिसने सदियों पुरानी मीडिया व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। कभी ‘चौथा स्तंभ’ कहे जाने वाले अखबार और टीवी चैनल्स आज अपनी साख और प्रभाव बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया एक ऐसे ‘सुपर प्लेटफॉर्म’ के रूप में उभरा है जहाँ सत्ता का गलियारा और जनता की आवाज़ एक ही धरातल पर आकर मिल गए हैं।

सियासत का नया ठिकाना: सोशल मीडिया बना नेताओं का ‘कवच’ और ‘हथियार’

भारतीय राजनीति में अब रैलियों की भीड़ से ज्यादा ‘ट्रेंड्स’ और ‘व्यूज’ की अहमियत होने लगी है। चाहे भाजपा की संगठित डिजिटल सेना हो, कांग्रेस का बदलता नैरेटिव हो, या सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों की अपनी मौजूदगी—सभी ने अब सोशल मीडिया की शरण ले ली है।
नेताओं के लिए अब किसी बड़े मीडिया हाउस के संपादक का मोहताज होना जरूरी नहीं रहा। एक ‘एक्स’ (ट्विटर) पोस्ट, एक फेसबुक लाइव या इंस्टाग्राम रील के जरिए नेता सीधे अपने मतदाताओं से संवाद कर रहे हैं। उभरते हुए युवा नेताओं के लिए तो सोशल मीडिया एक वरदान साबित हुआ है, जहाँ बिना भारी चुनावी बजट के भी वे अपनी विचारधारा को लाखों लोगों तक पहुँचा पा रहे हैं।

निजी डिजिटल चैनलों का उदय और दिग्गज पत्रकारों की ‘घर वापसी’

इस डिजिटल लहर ने मीडिया के स्थापित ढांचों को ध्वस्त कर दिया है। आज स्थिति यह है कि कई बड़े और प्रतिष्ठित टीवी चैनलों के एंकरों ने स्टूडियो की चकाचौंध छोड़कर अपने निजी यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज खोल लिए हैं। अजीत अंजुम, अभिसार शर्मा, अभिषेक उपाध्याय जैसे अनुभवी पत्रकारों ने यह साबित कर दिया है कि पत्रकारिता किसी की मोहताज नहीं होती।
ये पत्रकार अब किसी कॉर्पोरेट दबाव या चैनल की पॉलिसी से मुक्त होकर तीखे सवाल पूछ रहे हैं। वहीं, ध्रुव राठी जैसे ‘न्यू-एज’ कंटेंट क्रिएटर्स ने जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को इतनी सरलता से पेश किया है कि उनके व्यूज मुख्यधारा के चैनलों की टीआरपी (TRP) को कई गुना पीछे छोड़ रहे हैं। यह ‘डिजिटल एंकरिंग’ अब सीधे तौर पर स्थापित न्यूज़ चैनलों की विश्वसनीयता और उनकी कार्यप्रणाली को चुनौती दे रही है।

अखबारों की घटती बिक्री और टीआरपी का संकट

एक समय था जब सुबह की चाय के साथ अखबार का इंतजार होता था, लेकिन अब नोटिफिकेशन की घंटी खबरों का आगाज़ करती है। डिजिटल एक्सेसिबिलिटी के कारण अखबारों की प्रसार संख्या (Circulation) में भारी गिरावट आई है। विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा अब प्रिंट और टीवी से शिफ्ट होकर डिजिटल विज्ञापनों की ओर जा रहा है।
न्यूज़ चैनलों की हालत और भी चिंताजनक है। ‘शोर-शराबे’ वाली डिबेट्स और ‘सनसनीखेज’ खबरों से ऊब चुके दर्शक अब संतुलित और गहराई वाली जानकारी के लिए यूट्यूब और स्वतंत्र पोर्टल्स का रुख कर रहे हैं। टीआरपी की इस कमी ने न्यूज़ चैनलों को अपनी प्रासंगिकता बचाने के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया है।

सूचना के लोकतंत्रीकरण का नया युग 

सोशल मीडिया ने सूचना का ‘लोकतंत्रीकरण’ कर दिया है। अब खबर वह नहीं है जिसे कोई संपादक तय करे, बल्कि खबर वह है जिसे जनता देखना और साझा करना चाहती है। डिजिटल पत्रकारिता का यह दौर न केवल राजनीति के लिए नया द्वार खोल रहा है, बल्कि मीडिया जगत को भी यह आइना दिखा रहा है कि अंततः जनता ‘कंटेंट’ और ‘सच’ की ही पक्षधर होती है। आने वाले समय में वही टिका रहेगा जो तकनीक के साथ अपनी साख और तटस्थता को बचाए रख पाएगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भविष्य ‘डिजिटल’ है और इसकी कमान अब सीधे जनता के हाथों में है।

अजय श्रीवास्तव (सम्पादक -सत्यमेव टाइम्स )

 

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