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सत्यमेव टाइम्स में आपका स्वागत है   संतकबीरनगर जनपद के सदर तहसील क्षेत्र का ग्राम सिहोरवा दीगर इस वक्त एक बड़े प्रशासनिक तूफान की आहट से सहमा हुआ है। यहाँ सरकारी फाइलों में दर्ज 'बंजर' भूमि को दबंगों ने अपनी जागीर समझकर निगल लिया है। सनसनीखेज मामला यह है कि राजस्व कर्मियों की कथित 'साँठगाँठ' से दबंगों ने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 12 गाटा संख्याओं पर अवैध रूप से पक्का निर्माण और आलीशान मकान खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों के बीच अब यह चर्चा आम है कि क्या इस अवैध साम्राज्य पर 'बाबा का बुलडोजर' चलेगा या सिस्टम की सुस्ती यूं ही बनी रहेगी? आरोप है कि गाँव के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर बाउंड्री वॉल और पक्के मकान बना लिए हैं। इस अवैध कब्जे ने न केवल गाँव के रास्तों को बाधित किया है, बल्कि पशुओं के चरने और भविष्य की विकास योजनाओं पर भी ताला जड़ दिया है। हैरानी की बात यह है कि बिना प्रशासनिक सहमति के इतना बड़ा निर्माण खड़ा होना नामुमकिन है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रहा है। भ्रष्टाचार के इस खेल के खिलाफ एक सामाजिक कार्यकर्ता ने 25 मार्च को जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) के जरिए जिलाधिकारी से गुहार लगाई थी। और मांग की थी कि मौके पर पुलिस बल के साथ पैमाइश हो, अवैध मकानों को ध्वस्त किया जाए और दोषियों पर मुकदमा दर्ज हो। लेकिन अफसोस! 10 दिन बीत जाने के बाद भी फाइलें धूल फांक रही हैं और प्रशासन की चुप्पी उन दबंगों के हौसले बुलंद कर रही है जिन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को अपनी 'बपौती' बना लिया है। गौरतलब हो कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता-2006 की धारा-67 और लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम-1984 के तहत ऐसे अतिक्रमणकारियों के खिलाफ जेल और बेदखली का स्पष्ट प्रावधान है। अब सवाल यह उठता है कि क्या खलीलाबाद का तहसील प्रशासन उन रसूखदारों पर हाथ डालने की हिम्मत जुटा पाएगा? क्या सिहोरवा दीगर की जनता को उनका सार्वजनिक मार्ग वापस मिलेगा? सबकी निगाहें अब मुख्यमंत्री के उस कड़े संदेश पर टिकी हैं, जहाँ सरकारी जमीन कब्जाने वालों का ठिकाना सिर्फ और सिर्फ जेल या बुलडोजर के नीचे होता है.अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है और कब सिहोरवा दीगर की सरकारी जमीन से 'अवैध कब्जा' रूपी नासूर का खात्मा होता है!  

बाबा के बुलडोजर के निशाने पर कभी भी आ सकता है संतकबीरनगर का यह गांव

 

संतकबीरनगर जनपद के सदर तहसील क्षेत्र का ग्राम सिहोरवा दीगर इस वक्त एक बड़े प्रशासनिक तूफान की आहट से सहमा हुआ है। यहाँ सरकारी फाइलों में दर्ज ‘बंजर’ भूमि को दबंगों ने अपनी जागीर समझकर निगल लिया है। सनसनीखेज मामला यह है कि राजस्व कर्मियों की कथित ‘साँठगाँठ’ से दबंगों ने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 12 गाटा संख्याओं पर अवैध रूप से पक्का निर्माण और आलीशान मकान खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों के बीच अब यह चर्चा आम है कि क्या इस अवैध साम्राज्य पर ‘बाबा का बुलडोजर’ चलेगा या सिस्टम की सुस्ती यूं ही बनी रहेगी? आरोप है कि गाँव के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर बाउंड्री वॉल और पक्के मकान बना लिए हैं। इस अवैध कब्जे ने न केवल गाँव के रास्तों को बाधित किया है, बल्कि पशुओं के चरने और भविष्य की विकास योजनाओं पर भी ताला जड़ दिया है। हैरानी की बात यह है कि बिना प्रशासनिक सहमति के इतना बड़ा निर्माण खड़ा होना नामुमकिन है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रहा है। भ्रष्टाचार के इस खेल के खिलाफ एक सामाजिक कार्यकर्ता ने 25 मार्च को जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) के जरिए जिलाधिकारी से गुहार लगाई थी। और मांग की थी कि मौके पर पुलिस बल के साथ पैमाइश हो, अवैध मकानों को ध्वस्त किया जाए और दोषियों पर मुकदमा दर्ज हो। लेकिन अफसोस! 10 दिन बीत जाने के बाद भी फाइलें धूल फांक रही हैं और प्रशासन की चुप्पी उन दबंगों के हौसले बुलंद कर रही है जिन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को अपनी ‘बपौती’ बना लिया है। गौरतलब हो कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता-2006 की धारा-67 और लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम-1984 के तहत ऐसे अतिक्रमणकारियों के खिलाफ जेल और बेदखली का स्पष्ट प्रावधान है। अब सवाल यह उठता है कि क्या खलीलाबाद का तहसील प्रशासन उन रसूखदारों पर हाथ डालने की हिम्मत जुटा पाएगा? क्या सिहोरवा दीगर की जनता को उनका सार्वजनिक मार्ग वापस मिलेगा? सबकी निगाहें अब मुख्यमंत्री के उस कड़े संदेश पर टिकी हैं, जहाँ सरकारी जमीन कब्जाने वालों का ठिकाना सिर्फ और सिर्फ जेल या बुलडोजर के नीचे होता है.अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है और कब सिहोरवा दीगर की सरकारी जमीन से ‘अवैध कब्जा’ रूपी नासूर का खात्मा होता है!

 

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