संतकबीरनगर। किसी भी जनपद की प्रगति और खुशहाली केवल सरकारी बजट या संसाधनों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि इस बात पर टिकी होती है कि वहां का प्रशासनिक और पुलिस नेतृत्व किस आपसी तालमेल और विजन के साथ काम कर रहा है। संतकबीरनगर जिले के वर्तमान परिदृश्य को देखा जाए तो जिले के जिलाधिकारी आलोक कुमार और पुलिस अधीक्षक संदीप मीना की जुगलबंदी ने सुशासन का एक ऐसा बेमिसाल मॉडल पेश किया है, जिसकी चर्चा आज हर जुबान पर है। इन दोनों अधिकारियों के कार्यकाल की समीक्षा की जाए तो स्पष्ट होता है कि जहाँ एक ओर विकास कार्यों को पंख लगे हैं, वहीं दूसरी ओर कानून का राज और अधिक सुदृढ़ हुआ है। जिलाधिकारी आलोक कुमार ने जब जनपद की कमान संभाली तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती लंबित विकास परियोजनाओं को गति देना और प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाना था। उन्होंने अपनी कार्यप्रणाली में ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘त्वरित निर्णय’ को प्राथमिकता दी। जिले में करोड़ों की लागत वाली सड़क परियोजनाओं, विशेषकर मेहदावल क्षेत्र की कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे के सुधार में उन्होंने व्यक्तिगत रुचि लेकर बाधाओं को दूर किया। डीएम की कार्यशैली की सबसे बड़ी खूबी उनका फाइलों से बाहर निकलकर धरातल पर उतरना है। सरकारी अस्पतालों का औचक निरीक्षण हो या फिर चकबंदी के पेचीदा मामलों को सुलझाने के लिए गांवों में लगाई जाने वाली ‘जनचौपाल’, आलोक कुमार ने मौके पर ही समाधान खोजने की नई परंपरा शुरू की है। उनके नेतृत्व में राजस्व और विकास विभाग के बीच एक ऐसा सेतु बना है जिससे आम जनता की शिकायतों का निस्तारण अब समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित हो रहा है।
वहीं जिला प्रशासन के इस विकासोन्मुखी विजन को सुरक्षा का मजबूत कवच प्रदान किया है पुलिस अधीक्षक संदीप मीना ने। उनकी कार्यप्रणाली ‘सख्ती और संवेदनशीलता’ का एक अनूठा मिश्रण है। एसपी ने कार्यभार संभालते ही अपराधियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक प्रहार किए। अवैध खनन, भू-माफिया, गोकशी और संगठित अपराध के खिलाफ उनकी निरंतर कार्रवाई ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति में सुरक्षा का भाव पैदा किया है। उन्होंने पुलिसिंग को केवल थानों तक सीमित न रखकर उसे तकनीक और जनसंवाद से जोड़ा है। ‘ऑपरेशन त्रिनेत्र’ के तहत सीसीटीवी कैमरों का जाल बिछाना हो या महिला सुरक्षा के लिए ‘मिशन शक्ति’ जैसे अभियानों को प्रभावी बनाना, संदीप मीना ने पुलिस की छवि को एक अनुशासित और मददगार बल के रूप में स्थापित किया है। इन दोनों शीर्ष अधिकारियों की सबसे बड़ी उपलब्धि इनका आपसी समन्वय है। अक्सर प्रशासनिक और पुलिस महकमे के बीच सामंजस्य की कमी विकास की राह में रोड़ा बनती है, लेकिन संतकबीरनगर में डीएम और एसपी एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह काम कर रहे हैं। अतिक्रमण हटाओ अभियान हो, संवेदनशील इलाकों में शांति व्यवस्था बनाए रखना हो या फिर सरकारी संपत्तियों को अवैध कब्जे से मुक्त कराना—दोनों अधिकारियों ने कंधे से कंधा मिलाकर परिणाम दिए हैं। जिले के शैक्षणिक संस्थानों और औद्योगिक गतिविधियों के लिए जो भयमुक्त वातावरण आज दिख रहा है, वह इसी जुगलबंदी का सुखद परिणाम है। कुल मिलाकर डीएम आलोक कुमार और एसपी संदीप मीना का अब तक का कार्यकाल संतकबीरनगर के लिए एक ‘स्वर्ण काल’ की तरह साबित हो रहा है। जनता के बीच इन अधिकारियों के प्रति बढ़ता विश्वास इस बात का प्रमाण है कि यदि नेतृत्व संकल्पित हो, तो किसी भी जनपद की तकदीर बदली जा सकती है। यह जिला इन दोनों अधिकारियों के योगदान को लंबे समय तक याद रखेगा।