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सत्यमेव टाइम्स में आपका स्वागत है आलेख - मोहित मौर्य (वरिष्ठ पत्रकार -राजनैतिक चिंतक) भारत की आज़ादी की कहानी में राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्लाह ख़ान की अमर दोस्ती एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इन दोनों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद कराने का सपना देखा था। उनकी दोस्ती धर्म, जाति और सामाजिक सीमाओं से परे थी और प्रेम, एकता और आज़ादी की भावना की एक बेहतरीन मिसाल थी। उन्होंने अपने जीवन का त्याग और लगन के साथ आंदोलन और साधना के द्वारा देश की सेवा की और इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अपनी जगह बनाई। उनकी शहादत के बाद, उनके आदर्शों और जुनून ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया और आज भी उनकी कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहेगी। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ की मुलाकात फरवरी 1920 में शाहजहाँपुर में हुई थी। दोनों ने एवी रिच इंटर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी, जहाँ राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के सहपाठी थे। राम प्रसाद बिस्मिल एक उत्साही कवि और लेखक थे और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के एक महत्वपूर्ण नेता थे, जिसने भारत की आज़ादी के लिए हथियार उठाए थे। अशफाकउल्लाह खान भी एक शिक्षित और उत्साही युवक थे जो राम प्रसाद के विचारों से प्रेरित होकर उनके संगठन में शामिल हो गए। दोनों ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आर्य समाज मंदिर में देश की आज़ादी का खाका तैयार किया और अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया। यही कारण है कि आज भी शाहजहांपुर का आर्य समाज मंदिर हिन्दू- मुस्लिम एकता की मिसाल है । उनकी दोस्ती साझा विचारों, देशभक्ति और एकता पर आधारित थी, जो हिंदू-मुस्लिम एकता की एक दुर्लभ मिसाल थी। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ की दोस्ती और क्रांतिकारी गतिविधियाँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण ग्यारह वर्ष भारतीय संग्राम को समर्पित कर दिए और क्रांतिकारी आंदोलन को बृहत स्तर तक संगठित एवं संचालित किया। अशफाक उल्ला खाँ ने भी अपने जीवन को देश के हित में समर्पित किया और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने का प्रयास किया। वे सच्चे मुसलमान थे और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव नहीं करते थे। अशफाक बिस्मिल की संस्था 'मातृदेवी' में शामिल हुए और दोनों ने मिलकर क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। उनकी दोस्ती और बलिदान आज भी हमें प्रेरित करते हैं l काकोरी ट्रेन डकैती 1925 की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसमें अशफाकउल्लाह खान और राम प्रसाद बिस्मिल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने के लिए वित्तीय संसाधनो की आवश्यकता थी, इसी उद्देशय से, दोनों ने मिलकर एचएसआरए के लिए सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई और इसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस घटना के बाद, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया और कठोर दंड दिया गया। मुकदमे के दौरान, कई मुस्लिम न्यायाधीशों ने विशेषकर पुलिस कप्तान तशदाक हुसैन ने अशफाक को सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने ने सरकारी गवाह बनने से इनकार कर दिया और कहा कि इससे पूरे देश की बदनामी होगी। जेल में रहते हुए, दोनों ने एक-दूसरे का हौसला बढ़ाया और अपने आदर्शों पर अडिग रहे। राम प्रसाद बिस्मिल एक महान कवि थे और अशफाक के कहने पर उन्होंने 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' का शेर पढ़ा, जिससे अशफाक बहुत प्रभावित हुए। उनकी दोस्ती और बलिदान आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की भावना जगाती है। अशफाकउल्लाह खान ने राम प्रसाद बिस्मिल को अपने भाई से भी बढ़कर माना और दोनों ने देश भक्ति का जज्बा पैदा करने और गुलामी से निजात पाने के लिए काम किया। 1927 में ब्रिटिश सरकार ने राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां को काकोरी कांड में शामिल होने के कारण मौत की सज़ा सुनाई थी। 19 दिसंबर 1927 को दोनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। अशफ़ाक उल्ला खां ने फैजाबाद जेल में फांसी के समय कुरान की एक गठरी लटकाए और कलमा पढ़ते हुए शांति से फांसी को स्वीकार किया। वहीं राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में फांसी के समय कहा कि "तेरी मर्जी पूरी हो, और सिर्फ तू ही रहे, न मैं रहूँ, न मेरी ख्वाहिश। दोनों की दोस्ती और शहादत आज भी देशभक्ति की भावना जगाती है और हमें प्रेम, एकता और देशभक्ति की शक्ति का महत्व सिखाती है। उनकी कहानी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल: राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्लाह खान

आलेख – मोहित मौर्य (वरिष्ठ पत्रकार -राजनैतिक चिंतक)

भारत की आज़ादी की कहानी में राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्लाह ख़ान की अमर दोस्ती एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इन दोनों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद कराने का सपना देखा था। उनकी दोस्ती धर्म, जाति और सामाजिक सीमाओं से परे थी और प्रेम, एकता और आज़ादी की भावना की एक बेहतरीन मिसाल थी। उन्होंने अपने जीवन का त्याग और लगन के साथ आंदोलन और साधना के द्वारा देश की सेवा की और इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अपनी जगह बनाई। उनकी शहादत के बाद, उनके आदर्शों और जुनून ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया और आज भी उनकी कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहेगी।
राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ की मुलाकात फरवरी 1920 में शाहजहाँपुर में हुई थी। दोनों ने एवी रिच इंटर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी, जहाँ राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के सहपाठी थे। राम प्रसाद बिस्मिल एक उत्साही कवि और लेखक थे और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के एक महत्वपूर्ण नेता थे, जिसने भारत की आज़ादी के लिए हथियार उठाए थे। अशफाकउल्लाह खान भी एक शिक्षित और उत्साही युवक थे जो राम प्रसाद के विचारों से प्रेरित होकर उनके संगठन में शामिल हो गए। दोनों ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आर्य समाज मंदिर में देश की आज़ादी का खाका तैयार किया और अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया। यही कारण है कि आज भी शाहजहांपुर का आर्य समाज मंदिर हिन्दू- मुस्लिम एकता की मिसाल है । उनकी दोस्ती साझा विचारों, देशभक्ति और एकता पर आधारित थी, जो हिंदू-मुस्लिम एकता की एक दुर्लभ मिसाल थी।
राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ की दोस्ती और क्रांतिकारी गतिविधियाँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण ग्यारह वर्ष भारतीय संग्राम को समर्पित कर दिए और क्रांतिकारी आंदोलन को बृहत स्तर तक संगठित एवं संचालित किया। अशफाक उल्ला खाँ ने भी अपने जीवन को देश के हित में समर्पित किया और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने का प्रयास किया। वे सच्चे मुसलमान थे और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव नहीं करते थे। अशफाक बिस्मिल की संस्था ‘मातृदेवी’ में शामिल हुए और दोनों ने मिलकर क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। उनकी दोस्ती और बलिदान आज भी हमें प्रेरित करते हैं l
काकोरी ट्रेन डकैती 1925 की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसमें अशफाकउल्लाह खान और राम प्रसाद बिस्मिल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने के लिए वित्तीय संसाधनो की आवश्यकता थी, इसी उद्देशय से, दोनों ने मिलकर एचएसआरए के लिए सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई और इसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस घटना के बाद, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया और कठोर दंड दिया गया। मुकदमे के दौरान, कई मुस्लिम न्यायाधीशों ने विशेषकर पुलिस कप्तान तशदाक हुसैन ने अशफाक को सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने ने सरकारी गवाह बनने से इनकार कर दिया और कहा कि इससे पूरे देश की बदनामी होगी। जेल में रहते हुए, दोनों ने एक-दूसरे का हौसला बढ़ाया और अपने आदर्शों पर अडिग रहे। राम प्रसाद बिस्मिल एक महान कवि थे और अशफाक के कहने पर उन्होंने ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ का शेर पढ़ा, जिससे अशफाक बहुत प्रभावित हुए। उनकी दोस्ती और बलिदान आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की भावना जगाती है। अशफाकउल्लाह खान ने राम प्रसाद बिस्मिल को अपने भाई से भी बढ़कर माना और दोनों ने देश भक्ति का जज्बा पैदा करने और गुलामी से निजात पाने के लिए काम किया।
1927 में ब्रिटिश सरकार ने राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां को काकोरी कांड में शामिल होने के कारण मौत की सज़ा सुनाई थी। 19 दिसंबर 1927 को दोनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। अशफ़ाक उल्ला खां ने फैजाबाद जेल में फांसी के समय कुरान की एक गठरी लटकाए और कलमा पढ़ते हुए शांति से फांसी को स्वीकार किया। वहीं राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में फांसी के समय कहा कि “तेरी मर्जी पूरी हो, और सिर्फ तू ही रहे, न मैं रहूँ, न मेरी ख्वाहिश। दोनों की दोस्ती और शहादत आज भी देशभक्ति की भावना जगाती है और हमें प्रेम, एकता और देशभक्ति की शक्ति का महत्व सिखाती है। उनकी कहानी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

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