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सत्यमेव टाइम्स में आपका स्वागत है   भारत रत्न डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की जयंती आज समूचे राष्ट्र में सामाजिक चेतना और उल्लास के एक महाकुंभ के रूप में मनाई गई, लेकिन इस उत्सव की चमक के पीछे सामाजिक विद्वेष और हिंसा की कुछ बेहद चिंताजनक तस्वीरें भी उभर कर आईं। देश के करोड़ों लोगों ने जहाँ बाबा साहेब के संवैधानिक मूल्यों और भगवान बुद्ध के करुणा संदेश को नमन किया, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई संवेदनशील जिलों में शोभायात्राओं के दौरान हुए पथराव और झड़पों ने उत्सव के वातावरण को विषाक्त कर दिया। यह हिंसा न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि उन बुनियादी सवालों को भी जन्म देती है कि शांति और समानता के प्रणेता की जयंती पर समाज का एक वर्ग इतना हिंसक और आक्रामक क्यों हो जाता है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आज भी खुद को मुख्यधारा की व्यवस्था से कटा हुआ और अपमानित महसूस करता है, जिसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक भेदभाव की यह गहरी टीस ऐसे बड़े सार्वजनिक आयोजनों में अक्सर शक्ति प्रदर्शन और पहचान की लड़ाई के रूप में फूट पड़ती है। एक तरफ सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और दूसरी तरफ खुद को बौद्ध विचारधारा के शांतिप्रिय सिद्धांतों के करीब पाकर भी आचरण में हिंसा का समावेश होना, एक जटिल सामाजिक विरोधाभास पैदा करता है। आज कई शहरों में जब ये रैलियां और शोभायात्राएं पारंपरिक रूप से सवर्ण बस्तियों से गुजरीं, तो नारेबाजी, झंडे लगाने और संगीत के शोर को लेकर मामूली विवाद शुरू हुए, जिन्होंने देखते ही देखते हिंसक उपद्रव का रूप ले लिया। यह एक विडंबना ही है कि जो समुदाय बुद्ध के 'धम्म' और अहिंसा को अपना सर्वोच्च आदर्श मानता है, वह भीड़ के रूप में तब्दील होते ही उन हिंसक गतिविधियों में शामिल हो जाता है जो बाबा साहेब के संवैधानिक नैतिकता और कानून के शासन के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत हैं। प्रशासन को कई स्थानों पर स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों का सहारा लेना पड़ा, लेकिन इन प्रशासनिक कार्रवाइयों ने समाज के भीतर मौजूद गहरी खाई और बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण को एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। जयंती का यह पर्व जहाँ एक ओर सामाजिक जागृति का उत्सव था, वहीं दूसरी ओर इसने यह कड़वा संदेश भी दिया कि जब तक विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और संवेदनशीलता की कमी बनी रहेगी, तब तक उत्सवों के बीच हिंसा की ये चिंगारियां सुलगती रहेंगी। वर्तमान में पुलिस प्रशासन उपद्रवियों की पहचान कर कड़ी कार्रवाई करने में जुटा है, ताकि भविष्य में इस तरह के सांप्रदायिक और जातीय तनाव को रोका जा सके, परंतु असली समाधान केवल कानून में नहीं बल्कि उस सामाजिक हृदय परिवर्तन में है जिसकी कल्पना डॉ. अम्बेडकर ने की थी।

अम्बेडकर जयंती पर हिंसा के स्वर और संवैधानिक नैतिकता की चुनौती

 

भारत रत्न डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की जयंती आज समूचे राष्ट्र में सामाजिक चेतना और उल्लास के एक महाकुंभ के रूप में मनाई गई, लेकिन इस उत्सव की चमक के पीछे सामाजिक विद्वेष और हिंसा की कुछ बेहद चिंताजनक तस्वीरें भी उभर कर आईं। देश के करोड़ों लोगों ने जहाँ बाबा साहेब के संवैधानिक मूल्यों और भगवान बुद्ध के करुणा संदेश को नमन किया, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई संवेदनशील जिलों में शोभायात्राओं के दौरान हुए पथराव और झड़पों ने उत्सव के वातावरण को विषाक्त कर दिया। यह हिंसा न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि उन बुनियादी सवालों को भी जन्म देती है कि शांति और समानता के प्रणेता की जयंती पर समाज का एक वर्ग इतना हिंसक और आक्रामक क्यों हो जाता है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आज भी खुद को मुख्यधारा की व्यवस्था से कटा हुआ और अपमानित महसूस करता है, जिसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक भेदभाव की यह गहरी टीस ऐसे बड़े सार्वजनिक आयोजनों में अक्सर शक्ति प्रदर्शन और पहचान की लड़ाई के रूप में फूट पड़ती है।

एक तरफ सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और दूसरी तरफ खुद को बौद्ध विचारधारा के शांतिप्रिय सिद्धांतों के करीब पाकर भी आचरण में हिंसा का समावेश होना, एक जटिल सामाजिक विरोधाभास पैदा करता है। आज कई शहरों में जब ये रैलियां और शोभायात्राएं पारंपरिक रूप से सवर्ण बस्तियों से गुजरीं, तो नारेबाजी, झंडे लगाने और संगीत के शोर को लेकर मामूली विवाद शुरू हुए, जिन्होंने देखते ही देखते हिंसक उपद्रव का रूप ले लिया। यह एक विडंबना ही है कि जो समुदाय बुद्ध के ‘धम्म’ और अहिंसा को अपना सर्वोच्च आदर्श मानता है, वह भीड़ के रूप में तब्दील होते ही उन हिंसक गतिविधियों में शामिल हो जाता है जो बाबा साहेब के संवैधानिक नैतिकता और कानून के शासन के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत हैं।

प्रशासन को कई स्थानों पर स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों का सहारा लेना पड़ा, लेकिन इन प्रशासनिक कार्रवाइयों ने समाज के भीतर मौजूद गहरी खाई और बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण को एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। जयंती का यह पर्व जहाँ एक ओर सामाजिक जागृति का उत्सव था, वहीं दूसरी ओर इसने यह कड़वा संदेश भी दिया कि जब तक विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और संवेदनशीलता की कमी बनी रहेगी, तब तक उत्सवों के बीच हिंसा की ये चिंगारियां सुलगती रहेंगी। वर्तमान में पुलिस प्रशासन उपद्रवियों की पहचान कर कड़ी कार्रवाई करने में जुटा है, ताकि भविष्य में इस तरह के सांप्रदायिक और जातीय तनाव को रोका जा सके, परंतु असली समाधान केवल कानून में नहीं बल्कि उस सामाजिक हृदय परिवर्तन में है जिसकी कल्पना डॉ. अम्बेडकर ने की थी।

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