विश्व पर्यावरण दिवस पर हर घर में तुलसी लगाने का किया आह्वान
रिपोर्ट -कुलदीप मिश्र…..!!
संतकबीरनगर: भारतीय संस्कृति में सुख और शांति को सामाजिक सम्यकता से जोड़कर देखा जाता है जहाँ प्राणीमात्र की समृद्धि के लिए धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व आपस में समाहित हैं। इस पूरी व्यवस्था में सर्वोपरि स्थान तुलसी का है। जिसका पौराणिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णन मिलता है और इसी महत्ता को रेखांकित किया है उत्तर प्रदेश के कुशीनगर की पावन धरा पर जन्मी चार विश्व रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कराने वाली प्रख्यात शिक्षाविद व वरिष्ठ साहित्यकार डाक्टर शुभदा पाण्डेय ने। 
नागपुर विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. व एम.एड. की शिक्षा प्राप्त और पिछले चार दशकों से अध्यापन प्रशासन व शोध निर्देशन के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित करने वाली डॉ० पाण्डेय के विराट अनुभव और उनकी 35 मौलिक पुस्तकों की लेखनी में जहाँ एक ओर लोक परंपराओं के प्रति अगाध श्रद्धा दिखती है वहीं दूसरी ओर आधुनिक शोधपरक दृष्टि का समावेश है।
प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा श्रेष्ठ आचारों में प्रतिष्ठित गमलों से लेकर बाग-बगीचों तक पाए जाने वाले इस सचेतन पौधे के विषय में वे बताती हैं कि प्रायः हर घर के चौरे में नियमित पूजा-अर्चना और शाम को दीपक जलाने के पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार है। दैहिक दैविक और भौतिक शांति के साथ विकास का माध्यम मानी जाने वाली तुलसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड 63/11/14) में भी मंत्र आता है तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया। चिनोमी केशवस्यार्थो वरदा भव शोभने। त्वदड्गसम्भवैः पत्रै पूजयामि यथा हरिम्। तथा कुरु पवित्राडिग ! कलौ मलविनाशिनि। अर्थात् हे कलिमल का नाश करने वाली पवित्रांगी तुलसी। तुम अमृत से उत्पन्न और केशव को प्रिय हो मैं भगवान की पूजा के लिए तुम्हारे पत्तों को चुनता हूँ, तुम मेरे लिए वरदायिनी बनो ताकि मैं सदा श्री हरि का पूजन कर सकूँ। डॉ० शुभदा पाण्डेय की शोधपरक दृष्टि तुलसी के औषधीय और पर्यावरणीय चमत्कारों को आज के युग में अत्यंत प्रासंगिक मानती है। औसियम सैंक्टम नामक वैज्ञानिक नाम वाली इस मुख्य प्रजाति की मुख्यत दो जातियाँ श्यामा तुलसी और रामा तुलसी पाई जाती हैं। जिनकी गंध मात्र से कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। कफ, पित्त, वायु का शमन करने व चर्मरोगों में उपयोगी होने के कारण तथा विभिन्न महामारियों में अपने अचूक प्रभाव व दर्दनाशक गुण की वजह से इसे शूलघ्नी भी कहा जाता है। वायु प्रदूषण रोकने में इसका कोई जवाब नहीं है। इसकी सूखी पत्तियाँ भोज्य पदार्थों को सड़ने से बचाती हैं और इसमें मौजूद हरितलवक (क्लोरोफिल) निरंतर कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर रासायनिक क्रिया द्वारा जीवनदायिनी ऑक्सीजन विसर्जित करता रहता है। साहित्य जगत के लिए प्रेरणापुंज बनीं डॉ० शुभदा पाण्डेय के अटूट परिश्रम और मेधा से उपजे ये विचार हमें याद दिलाते हैं कि तुलसी केवल एक पौधा नहीं, बल्कि निरंतर पर्यावरण को शुद्ध करने वाली हमारी प्राणवायु का आधार है इसीलिए विश्व पर्यावरण दिवस पर हर घर में तुलसी लगाने का उपक्रम अनिवार्य रूप से होना चाहिए।