





संतकबीरनगर। मगहर की सरजमीं से शुरू हुआ कानूनी विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुंचकर खत्म हो गया। एडवोकेट कुलदीप मिश्र के अधिवक्ता पंजीकरण को रद्द कराने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे अभिजीत श्रीवास्तव को राहत नहीं मिली। 10 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति के 29 अप्रैल 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।
मामले की शुरुआत 29 अप्रैल 2024 को हुई थी। मगहर के तिवारी टोला निवासी अभिजीत श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश बार कौंसिल में शिकायत दर्ज कराते हुए एडवोकेट कुलदीप मिश्र की जन्मतिथि में कथित विसंगति और आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने जैसे आरोप लगाए थे। शिकायत के जवाब में कुलदीप मिश्र की ओर से कहा गया कि पंजीकरण के समय हलफनामे के माध्यम से आवश्यक तथ्यों का खुलासा किया गया था और उनके पक्ष में संबंधित अभिलेख भी प्रस्तुत किए गए।
राज्य बार कौंसिल में निर्धारित अवधि में मामले का निस्तारण नहीं होने के बाद नियमानुसार प्रकरण बार कौंसिल ऑफ इंडिया को भेजा गया। वहां अनुशासन समिति ने मूल पंजीकरण अभिलेखों और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद 29 अप्रैल 2026 को शिकायत को निरस्त कर दिया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने एडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 38 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 13 जुलाई 2026 को दायर अपील पर 10 अगस्त को सुनवाई हुई। शिकायतकर्ता की ओर से छह अधिवक्ताओं के उपस्थित होने के बावजूद शीर्ष अदालत ने बीसीआई की अनुशासन समिति के निर्णय में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं मानी।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वह भारतीय बार कौंसिल की अनुशासन समिति द्वारा पारित 29 अप्रैल 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने की इच्छुक नहीं है और तदनुसार अपील खारिज की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद एडवोकेट कुलदीप मिश्र के अधिवक्ता पंजीकरण पर उठाए गए सवालों को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई फिलहाल समाप्त हो गई है।