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  बुधवार की रात से आसमान पर छाए बादलों ने जब गुरुवार की सुबह संतकबीरनगर की धरती को रिमझिम बूंदों से भिगोया, तो लगा जैसे मौसम ने अचानक समय की घड़ी को करीब 35 वर्ष पीछे मोड़ दिया हो। खिड़की के शीशे पर ठहरी बूंदों को देखते-देखते मन जाने कब उस उम्र में पहुंच गया, जब बारिश का इंतजार मौसम विभाग की भविष्यवाणी से नहीं, बल्कि आसमान में उमड़ते बादलों को देखकर किया जाता था।तब बारिश का अर्थ था-स्कूल से लौटते हुए भीग जाना, कच्ची गलियों में पानी भरना, कागज की नाव बनाना और उसे पानी की धार के साथ दौड़ाना। किसी की नाव थोड़ी दूर तक चली जाए तो वह दिन की सबसे बड़ी जीत होती थी। न कोई मोबाइल था, न इंटरनेट, न मनोरंजन के इतने साधन। बारिश की बूंदें ही खेल थीं और मिट्टी की खुशबू ही मन का संगीत।आज वही बारिश खलीलाबाद और आसपास की गलियों में उतरती है तो सबसे पहले नजर सड़क पर जमा पानी, कीचड़ और यातायात पर जाती है। लेकिन बचपन में पानी देखकर हम रास्ता नहीं तलाशते थे, बल्कि रास्ते में पानी तलाशते थे। जहां ज्यादा पानी मिला, वहीं छपाक से पैर डाल दिए। कपड़े गंदे होने की चिंता नहीं, घर पहुंचकर डांट पड़ने का डर नहीं,बस बारिश में भीगने की खुशी थी। आज से करीब तीन-चार दशक पहले गांव-कस्बे का जीवन भी कुछ अलग था। बरसात शुरू होते ही घरों के दरवाजों पर बच्चों की भीड़ लग जाती थी। कोई पेड़ की डाल पकड़कर झूल रहा होता, कोई बारिश की धार में नहा रहा होता और कोई हथेली फैलाकर बूंदों को गिनने की कोशिश करता। कच्चे रास्तों पर बहता पानी हमारे लिए किसी नदी से कम नहीं था। और फिर आती थी मां की आवाज—“बहुत भीग लिए, अब घर आ जाओ।” उस एक आवाज में डांट भी होती थी और चिंता भी। घर पहुंचते ही सूखे कपड़े, तौलिया और रसोई से आती गरम चाय-पकौड़ी की खुशबू जैसे बारिश की सारी थकान चुरा लेती थी। कभी चूल्हे पर चढ़ी कढ़ाही में पकौड़ियां छनती थीं तो कभी भुट्टे की महक पूरे आंगन में फैल जाती थी। बारिश बाहर बरसती थी और घर के भीतर अपनापन पकता था। कभी बिजली चली जाती तो शाम और भी खूबसूरत हो जाती। लालटेन या ढिबरी की हल्की रोशनी में पूरा परिवार एक जगह बैठ जाता। बाहर छप्पर पर गिरती बूंदों की टप-टप... टप-टप... और भीतर बुजुर्गों की कहानियां। कोई पुरानी घटना सुनाता, कोई लोककथा, तो बच्चे उसी कहानी में अपनी कल्पना का संसार खोज लेते। उस समय शायद किसी को मालूम नहीं था कि ये साधारण शामें एक दिन जिंदगी की सबसे अनमोल यादें बन जाएंगी।आज संतकबीरनगर फिर बारिश से नहा रहा है। खेतों में धान की हरियाली बारिश की बूंदों से चमक रही है। पेड़ों की पत्तियां धुलकर नई-सी लग रही हैं। सड़क किनारे चाय की दुकानों पर उठती भाप, भीगी मिट्टी की खुशबू और छतों से गिरती पानी की धार,सब कुछ जैसे कोई पुरानी तस्वीर सामने रख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि बारिश वही है, आसमान वही है, मिट्टी की खुशबू भी वही है, बस बारिश को देखने वाली आंखें अब बड़ी हो गई हैं.बचपन में बारिश हमें बाहर बुलाती थी, आज वही बारिश हमें भीतर बुलाती है मतलब अपने भीतर, अपनी स्मृतियों के भीतर। खिड़की के बाहर गिरती हर बूंद जैसे बीते दिनों का कोई दरवाजा खटखटाती है।कभी कागज की नाव याद आती है, कभी दोस्तों की शरारत, कभी मां की पुकार और कभी वह आंगन जहां बारिश रुकने के बाद भी हम भीगते रहते थे।शायद बारिश की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वह केवल धरती को नहीं भिगोती, यादों को भी जगा देती है। वह मन की उस पुरानी अलमारी को खोल देती है, जिसमें 35 साल पुराना बचपन आज भी मुस्कुराता हुआ बैठा है।बारिश आज भी वही है... बस अब उसमें भीगने वाला बच्चा, हमारी यादों में रहता है।

रिमझिम फुहारों में लौट आया बचपन : जब बारिश सिर्फ मौसम नहीं हुआ करती थी

 

बुधवार की रात से आसमान पर छाए बादलों ने जब गुरुवार की सुबह संतकबीरनगर की धरती को रिमझिम बूंदों से भिगोया, तो लगा जैसे मौसम ने अचानक समय की घड़ी को करीब 35 वर्ष पीछे मोड़ दिया हो। खिड़की के शीशे पर ठहरी बूंदों को देखते-देखते मन जाने कब उस उम्र में पहुंच गया, जब बारिश का इंतजार मौसम विभाग की भविष्यवाणी से नहीं, बल्कि आसमान में उमड़ते बादलों को देखकर किया जाता था।तब बारिश का अर्थ था-स्कूल से लौटते हुए भीग जाना, कच्ची गलियों में पानी भरना, कागज की नाव बनाना और उसे पानी की धार के साथ दौड़ाना। किसी की नाव थोड़ी दूर तक चली जाए तो वह दिन की सबसे बड़ी जीत होती थी। न कोई मोबाइल था, न इंटरनेट, न मनोरंजन के इतने साधन। बारिश की बूंदें ही खेल थीं और मिट्टी की खुशबू ही मन का संगीत।आज वही बारिश खलीलाबाद और आसपास की गलियों में उतरती है तो सबसे पहले नजर सड़क पर जमा पानी, कीचड़ और यातायात पर जाती है। लेकिन बचपन में पानी देखकर हम रास्ता नहीं तलाशते थे, बल्कि रास्ते में पानी तलाशते थे। जहां ज्यादा पानी मिला, वहीं छपाक से पैर डाल दिए। कपड़े गंदे होने की चिंता नहीं, घर पहुंचकर डांट पड़ने का डर नहीं,बस बारिश में भीगने की खुशी थी। आज से करीब तीन-चार दशक पहले गांव-कस्बे का जीवन भी कुछ अलग था। बरसात शुरू होते ही घरों के दरवाजों पर बच्चों की भीड़ लग जाती थी। कोई पेड़ की डाल पकड़कर झूल रहा होता, कोई बारिश की धार में नहा रहा होता और कोई हथेली फैलाकर बूंदों को गिनने की कोशिश करता। कच्चे रास्तों पर बहता पानी हमारे लिए किसी नदी से कम नहीं था।

और फिर आती थी मां की आवाज—“बहुत भीग लिए, अब घर आ जाओ।”

उस एक आवाज में डांट भी होती थी और चिंता भी। घर पहुंचते ही सूखे कपड़े, तौलिया और रसोई से आती गरम चाय-पकौड़ी की खुशबू जैसे बारिश की सारी थकान चुरा लेती थी। कभी चूल्हे पर चढ़ी कढ़ाही में पकौड़ियां छनती थीं तो कभी भुट्टे की महक पूरे आंगन में फैल जाती थी। बारिश बाहर बरसती थी और घर के भीतर अपनापन पकता था। कभी बिजली चली जाती तो शाम और भी खूबसूरत हो जाती। लालटेन या ढिबरी की हल्की रोशनी में पूरा परिवार एक जगह बैठ जाता। बाहर छप्पर पर गिरती बूंदों की टप-टप… टप-टप… और भीतर बुजुर्गों की कहानियां। कोई पुरानी घटना सुनाता, कोई लोककथा, तो बच्चे उसी कहानी में अपनी कल्पना का संसार खोज लेते। उस समय शायद किसी को मालूम नहीं था कि ये साधारण शामें एक दिन जिंदगी की सबसे अनमोल यादें बन जाएंगी।आज संतकबीरनगर फिर बारिश से नहा रहा है। खेतों में धान की हरियाली बारिश की बूंदों से चमक रही है। पेड़ों की पत्तियां धुलकर नई-सी लग रही हैं। सड़क किनारे चाय की दुकानों पर उठती भाप, भीगी मिट्टी की खुशबू और छतों से गिरती पानी की धार,सब कुछ जैसे कोई पुरानी तस्वीर सामने रख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि बारिश वही है, आसमान वही है, मिट्टी की खुशबू भी वही है, बस बारिश को देखने वाली आंखें अब बड़ी हो गई हैं.बचपन में बारिश हमें बाहर बुलाती थी, आज वही बारिश हमें भीतर बुलाती है मतलब अपने भीतर, अपनी स्मृतियों के भीतर। खिड़की के बाहर गिरती हर बूंद जैसे बीते दिनों का कोई दरवाजा खटखटाती है।कभी कागज की नाव याद आती है, कभी दोस्तों की शरारत, कभी मां की पुकार और कभी वह आंगन जहां बारिश रुकने के बाद भी हम भीगते रहते थे।शायद बारिश की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वह केवल धरती को नहीं भिगोती, यादों को भी जगा देती है। वह मन की उस पुरानी अलमारी को खोल देती है, जिसमें 35 साल पुराना बचपन आज भी मुस्कुराता हुआ बैठा है।बारिश आज भी वही है… बस अब उसमें भीगने वाला बच्चा, हमारी यादों में रहता है।

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