बड़ा नजीर बना DM का यह इंसाफ : फर्जी दलित उत्पीड़न केस में फंसे लोगों को मिली राहत
संतकबीरनगर। मगहर कस्बे में खुद को दलित बताकर दूसरों पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराने वाले एक परिवार के खेल का प्रशासन ने अंत कर दिया है। जिलाधिकारी (DM) आलोक कुमार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए अभिमन्यु प्रसाद और उनके पूरे परिवार का ‘अनुसूचित जाति’ (SC) का प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया है। जांच में सामने आया कि यह परिवार दलित श्रेणी की ‘तुरैहा’ जाति का नहीं, बल्कि ‘तुरहा’ जाति का है, जो सामान्य श्रेणी में आती है। DM के इस फैसले ने न केवल पीड़ितों को बड़ी राहत दी है, बल्कि जिले के प्रशासनिक इतिहास में जिलाधिकारी आलोक कुमार की छवि को एक ‘न्याय के नायक’ के रूप में भी स्थापित किया है। DM के इस फैसले ने न केवल फर्जीवाड़े की नींव हिला दी है, बल्कि उन लोगों के लिए एक नजीर पेश की है जो कानून का दुरुपयोग कर दूसरों का उत्पीड़न करते हैं।
इस पूरे मामले का पर्दाफाश करने में अधिवक्ता कुलदीप मिश्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने राज्य से लेकर केंद्र स्तर तक लंबी लिखापढ़ी की और साक्ष्यों का ऐसा अंबार खड़ा किया, जिससे फर्जीवाड़े की दीवार ढह गई।
बताते चले कि डीएम की अध्यक्षता वाली समिति की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह परिवार अनुसूचित जाति ‘तुरैहा’ नहीं, बल्कि ‘तुरहा’ जाति का है, जो किसी भी आरक्षित श्रेणी में सूचीबद्ध नहीं है। यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंगल प्रसाद वर्मा, अधिवक्ता कुलदीप मिश्र और ठेकेदार उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने साक्ष्यों के साथ जिलाधिकारी से शिकायत की। जांच के दौरान सामने आया कि अभिमन्यु प्रसाद ने तथ्यों को छिपाकर फर्जी प्रमाण-पत्र बनवाया और इसका इस्तेमाल भाजपा नेत्री व नगर पंचायत मगहर की तत्कालीन चेयरमैन संगीता वर्मा, ठेकेदार शैलेश श्रीवास्तव और उमेश चन्द्र श्रीवास्तव के विरुद्ध एससी-एसटी एक्ट के तहत गंभीर मुकदमा दर्ज कराने के लिए किया। इतना ही नहीं, आरोपी ने इसी फर्जी पहचान के आधार पर प्रधानाचार्य डॉ. राकेश सिंह और अधिवक्ता कुलदीप मिश्र के खिलाफ भी न्यायालय में धारा 156(3) के तहत प्रार्थना पत्र दिया था, जिसे कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। उसने जांच करने वाले हेड कांस्टेबल राम विनय यादव के विरुद्ध भी परिवाद दाखिल कर रखा है।आपको भी दें कि जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति, जिसमें एडीएम जय प्रकाश, एसडीएम खलीलाबाद और जिला समाज कल्याण अधिकारी शामिल थे, ने अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर पाया कि वर्ष 1359 फसली के राजस्व रिकॉर्ड और स्कूल की टीसी में भी इस परिवार की जाति ‘तुरहा’ ही दर्ज है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति शोध प्रशिक्षण संस्थान, लखनऊ की रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की कि ‘तुरहा’ जाति अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आती। प्रमाण-पत्र निरस्त होने के बाद अब शिकायतकर्ताओं ने जिलाधिकारी से मांग की है कि अभिमन्यु के खिलाफ जालसाजी की एफआईआर दर्ज कराई जाए और अब तक सरकार से लिए गए समस्त अनुदानों की रिकवरी की जाए। इस फैसले से फर्जी प्रमाण-पत्र धारकों में हड़कंप मचा हुआ है।

